पुरातात्विक महत्व-हनुमानगढ़

हनुमानगढ़ जिले का पुरातात्विक महत्व

राजस्थान राज्य का हनुमानगढ़ जिले का पुरातात्विक दृष्टि से खासा महत्व हैं। हनुमानगढ़ ही वह जिला है जहाँ हुई खुदाई से अति प्राचीन नदी घाटी सभ्यता का केंद्र होने का पता चला हैं, जो हजारों साल पुरानी समद्ध संस्कृति को महिमा मंडित करती हैं । इस जिले में 100 से अधिक थेहड़ हैं जहाँ प्राचीन संस्कृति के अवशेष दबे पड़े हैं। यहाँ से प्राप्त मूर्तियां सिक्के तथा अन्य वस्तुऐं यह प्रमाणित करती हैं यह इलाका विभिन कालों की संस्कृति का पोषक और राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उथल पुथल से प्रभावित रहा हैं।

पल्लू, धानसिया, करोति, सोती, पाण्डूसर, सोनड़ी, थिराना, रावतसर, लाडम, मंदरपुरा, जबरासर, भोमियों  की ढाणी, भूकरका, बिरकाली, सिरंगसर, खोडा, न्योलकी, धांधूसर, बिसरासर, हनुमानगढ़, मुंडा, मसानी, गंगागढ़, रोही, मक्कासर, सहजीपुरा, बहलोल नगर, दुलमाना, रंगमहल, बड़ोपल, डबलीराठान और कालीबंगा आदि ऐसे गाँव है जहाँ थेहड़ बने हुये हैं।

कालीबंगा में खुदाई से प्राप्त हुए अवशेषों से पता चला कि यहाँ निल, वोल्गा और सिंधु घाटियों से भी प्राचीन सभ्यता थी। महाभारत में वर्णित अष्ठमुनिकार मानवीय अस्थिपंजर, अज्ञातलिपि के लेख, मुद्राएं, मोहरे, मिट्टी के बर्तन, बहुमुल्य गहने, मनके, मूर्तियां, खिलौने, कुँए, स्नानागार, किला, सुव्यवस्थित गलियां, चौराहें व नालियां यहां के थेहड़ों से से प्राप्त हुए।

 पूर्व-हड़प्पा कालीन कालीबंगा:

हड़प्पा सभ्यता लगभग 5,000 वर्ष पुरानी है, कालीबंगा और राखीगढ़ी की खुदाई में मिले वस्तुओं के नमूने स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित करते हैं कि ईसा के जन्म के तीन हजार वर्ष पूर्व भारत एक संपन्न विकसित देश था और साज सिंगार के साथ अनेक वस्तुओं का उस समय निर्यात होता था। खुदाई के दौरान मिली वस्तुओं में से कुछ निम्न:

टेराकोटा या मिट्टी के बर्तन:

कालीबंगा में पूर्व-हड़प्पा कालीन खाने की थालीयाँ, कुंड़े, नीचे से पतले ऊपर से प्याले नुमा गिलास, लोटे, चषक और संचयन के लिये  टेराकोटा या मिट्टी के बर्तन मिले हैं। इन मिट्टी के बर्तनों में कई सादे और कुछ चित्रकारी किये हुये हैं। इन को आकार, चित्रकारी और पाये जानेवाले स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे घरेलू, धार्मिक और समाधी या दफनाने के  लिये प्रयोग में आने वाली वस्तुएं। पूर्व-हड़प्पा मिट्टी के बर्तनों में कई सादे और कुछ चित्रकारी किये हुये हैं,  इन बर्तनों के विशिष्ट लक्षण निम्न हैं:

      • ये बर्तन कुम्हार के चाक पर बने होने के बावजूद भी लापरवाही से बने हुये लगते हैं। कुछ बर्तनों में बहुत सुधार मिलता हैं लेकिन सभी पात्र ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कि जानबूझ कर उन के निचले आधे भाग को मोटा कर दिया गया हो।
      • लाल पृष्ठभूमि पर फूल, जानवरों को काले रंग में चित्रित किया गया हैं। इन में से कई पर हल्के-काले रंग की आकृतियाँ भी शामिल हैं, जिन्हें अधिक उभारने के लिये सफेद रेखाओं का प्रयोग किया गया है। आकृतियों में अर्धवृत्त, जाली, कीड़े, फूल, पत्ते, पेड़ इत्यादि पसंदीदा रूपांकन थे।
      • काले और लाल रंग के बरतनों पर फूलो और मछली, बत्तख, कछुआ और हरिण आदि जानवरों की आकृतियाँ चित्रित की गई हैं।
      • इसमें कुछ पर तिरछी रेखायें या अर्धवृत्त चित्रित हैं, जबकि अधिकांश बर्तन सादे हैं और इनमें से कुछ मोटे और मजबूत भी हैं।
      • कुछ बर्तन सुघडाई से बने हुये, चिकने और हलके नीले रंग की आभा लिये हुये हैं। कुछ बर्तन हल्के रंग के और कुछ भूरे रंग के हैं। ये अब तक के मिले पूर्व-हड़प्पा कालीन बर्तनों में से सबसे अच्छे परिमार्जित बर्तन हैं।
पत्थर से बनी वस्तुयें:

खुदाई में पत्थरो से बनी कई सामग्रीयाँ मिली हैं।

      • पत्थरो से बने बर्तन जिन पर आकृतीयाँ उत्कीर्ण की हुई हैं।
      • शतरंज के खिलौने नुमा प्यादे,
      • गेदें, चक्की और मूसल शामिल हैं।
शस्त्र :

तांबे के शस्त्र,  कुल्हाड़ी, छैनी, भाला, नोंक वाला बरछा, चकमक से बनी छुरीयाँ और हड्डी के नुकीले टुकड़े मिले हैं।

टेराकोटा या मिट्टी के खिलौने और आकृतियाँ:

कालीबंगा में मिट्टी की अनेक सामग्री मिली हैं, जिन्हें आग में पका कर बनाया गया था।

      • पशु, मानव, देवी मुद्रा प्रतिमायें,
      • कालीबंगा की सबसे अच्छी टेराकोटा प्रतिमा एक आक्रमक बैल है जिसे “हड़प्पा युग की यथार्थवादी और शक्तिशाली लोक कला” का प्रतीक माना जा सकता है।
      • कालीबंगा में खिलौना-गाड़ी, पहिया और टूटा हुआ बैल; जिस से यह झात होता हैं कि कालीबंगा में गाड़ियां परिवहन के लिए उपयोग की जाती थीं।

योरोपियन मत यह हैं कि तिल्ली वाले पहिये का उपयोग भारत में नहीं होता था। लेकिन यह मानना गलत होगा कि हड़प्पा वासियों ने तिल्ली वाले पहिये का उपयोग नहीं किया। देश की गर्म और आर्द्र जलवायु जो समय के दौरान सभी कार्बनिक पदार्थों को नष्ट कर देती है। ऐसे हलात में लकड़ी के पहियों के अवशेषों की अपेक्षा करना बहुत अधिक होगा। खुदाई में पाए गए टेराकोटा नमूनों पर, पहिये को केंद्र से परिधि तक विकिरणित चित्रित रेखाओं द्वारा दिखाया गया है, जबकि दूसरे नमूने में ये कम उभरे हुये हैं। यह एक तकनीक हैं जो सदियों से अभी तक चली आ रही हैं। नमूने स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित करते हैं कि कालीबंगा के लोग तिल्ली वाले पहिया से पूरी तरह परिचित थे।

बांट:  

खुदाई के दौरान कई वजन मापने के बांट-बांटकरी मिले हैं।

आभूषण:

कालीबंगा में खुदाई के दौरान अनेक अर्घ मूल्यवान पत्थर से बने आभूषण मिले हैं।

        • स्फटिक और गोमेद से बनी छोटी पत्तीयाँ कुछ जड़ी हुई और कुछ दाँतेदार,
        • सेलखड़ी, सीप, इन्द्रगोप, टेराकोटा और तांबे के मोती
        • तांबे, सीप,काँच, हड्डी,स्वर्ण से बनी अंगूठी, माला और आभूषण
        • टेराकोटा से बनी चूड़ियाँ

यहाँ अनेक प्रकार की चूड़ियाँ मिली हैं जो यह इंगित करती हैं कि यह शहर टेराकोटा चूड़ियों के लिए जाना जाता होगा। इन सबको देखते हुये यह निष्कर्ष निकलता हैं कि यहाँ के लोगों का कलात्मक रूझान रहा होगा और वे श्रृंगार के प्रसाधन निर्यात भी करते होगें।

मुहर:

इस चरण की कई मुहरें, मुहरबंदी, मुद्रा, मिली हैं। इन में से  उल्लेखनीय एक बेलनाकार मुहरें है, जिन में आकृति के द्वारा यह दर्शाया गया है:

        • भालो के साथ लड़ते दो पुरुषों के बीच एक महिला आकृति हैं जो संभव हैं धमकी दे रही हो या समझौता करवा रही हो।
        • दर्शक के रूप में आधे मानव आधे बैल की आकृतीयाँ बनी हुई है। कहीं पर एक और कही दो आकृतीयाँ है और ये सभी आयताकार हैं।
        • सैंधव लिपि में दाहिने से बायें लिखा हैं, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका हैं।
        • गोल नरम पत्थर की मुद्रा पर व्याघ्र या शेर का चित्र अंकित हैं।
रंगमहल के थेहड़

यह स्थान ठेठ चीनी मिट्टी   (सिरेमिक) से बनी वस्तओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था, जिसे रंग महल वेयर संस्कृति कहा जाता है। यह विशिष्ट मिट्टी के बर्तन कुम्हार के चाक पर बने,  लाल या गुलाबी रंग के हैं। बर्तनों में जार और हांडी शामिल हैं जो गोलाकार या अंडाकार हैं जिनके किनारे उठे हुये हैं। कई  हांडीयों के किनारे को लहरदार ऊभारा गया हैं। कुछ हांडीयों और फूलदान की गर्दन को काले-लाल रंग की पॉलिश कर के सजावट के लिये चित्रित किया गया है। अन्य प्रकार की वस्तओं में  टोंटीदार बर्तन, खाना पकाने के बर्तन, भंडारण जार, विभिन्न किस्मों के कटोरे, दीपक, धूप-दान आदि शामिल हैं। कुछ नक्काशीदार हांडीयों पर वस्त्र के निशान भी मिले हैं। ढाला मिट्टी के बर्तनों में कटोरा और लघु बेसिन प्रमुख है। सांस्कृतिक संयोजन में मूर्तियाँ, टेराकोटा पशु मूर्तियाँ, गाड़ियाँ, पहिये, बाट, गेंदें, मांस- मांस-घिसने वाला पत्थर,पासा, पुटकी टैंकों, कुम्हार की मोहरें, कुदाल, कान के गहने, मूंगा, लैपीस और सीप के मोती, हुंड़ी, घुमने वाली चक्की, मूसल और हड्डी और लोहे की वस्तुएं शामिल हैं।

पल्लू गाँव के थेहड़

हनुमानगढ़ जिले के गाँव पल्लू के बीचोबीच एक प्राचीन थेहड़ बना हुआ है। सन 1917 में इटली के राजस्थानी भाषाविद्ध और पुरावेत्ता डॉ लुई. जी पीओ टैस्सीटोरी ने पल्लू गाँव के पुराने थेहड़ की खुदाई कराई और यहाँ के थेहड़ से अनेक छोटी-बड़ी वास्तु एवं शिल्पकला की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं, उसमें प्रमुख हैं पल्लू गाँव के थेहड़ से प्राप्त 11 वीं  शताब्दी की दो जैन सरस्वती मूर्तियाँ, जो शिल्पकला का अद्भुत नमूना हैं। इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता हैं कि दो बार ड़ाक विभाग द्वारा इस पर स्टैम्प जारी की गई। उनमें से एक मूर्ति आज राष्ट्रीय संग्राहालय दिल्ली की शोभा बढ़ा रही है तो दूसरी बीकानेर के संग्राहालय की। इन जैन सरस्वती की मूर्तियों से यह अनुमान लगाया जाता है की 11 वीं शताब्दी में पल्लू निवासी जैन धर्म को मानने वाले थे।

राष्ट्रीय संग्राहालय नई दिल्ली में सरस्वती मूर्ति

शिल्प कला की 1.48 मीटर ऊँचाई की अत्यंत दुर्लभ प्रस्तुति, जिसमें देवी सरस्वती की चार-भुजा धारी, दिव्य छवि वाली प्रतिमा अत्यधिक परिष्कृत और नाजुक रूप से सफेद संगमरमर में उकेरी गई हैं, लेकिन समय की मार से इसकी दिव्य सफेदी पीली हो गई हैं। जैन काल में छवियों की प्रतीकात्मक परंपरा है, जिसमें विशेष रूप से ‘प्रभा’ के शीर्ष पर तीर्थंकर की प्रतिमा अधीनस्थ जैन देवताओं की छवियों पर होना अनिवार्य हैं। चार-भुजा धारी सरस्वती एक पूर्ण विकसित पदम्-पुष्प पर आकर्षक त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है। उनके हाथों में कमल, बायें हाथ में डोरी से बँधी हुई एक ताड़पत्रीय पोथी, कमंडल और अक्षमाला के साथ निचला दाहिन हाथ में ‘वरद मुद्रा’ में हैं। मूर्ति एक पारदर्शी वस्त्र धारण किये  हुये हैं। इसे आभूषणों की एक विस्तृत श्रृंखला से अलंकृत किया गया हैं जो कि आमतौर पर समकालीन चित्रों में पाये जाते हैं, विशेष रूप से बाहों पर के आभूषण, हथेलियों के पीछे की ओर का नाजुक तार और स्तनों की गोलाई को परिभाषित करते हुए आभूषण, लंबी नुकीली उंगलियां और नुकीले नाखून के साथ बहुत ही आकर्षक, असाधारण रूप से साँचे में ढ़ली नाजुक आकृति हैं।

पैरो के पास वीणा और एकतारा जैसा छोटा वाद्य यंत्र बजानेवाली परिचारिकायें और दाता दंपत्ति या तो राजा-रानी या कोई धनी व्यापारी और उसकी पत्नी हो सकते हैं, उनकी आकृति बनी हुई हैं। इसके अलावा प्रतिमा के पैरों के चारो ओर गंधर्व की भूमिका वाली वीणा की क्षतिग्स्त आकृति भी दिखाई देती हैं। इसकी प्रतीकात्मक विशिष्टता को देखते हुये, निश्चित रूप से कहा जा सकता हैं कि वाग्देवी की यह प्रतिमा जैन काल का प्रतिनिधत्व करती हैं। जैन बाहुल्य क्षेत्र से प्राप्त यह मूर्ति चौहान काल की एक उत्कृष्ट कृति मानी जाती हैं।देश को गौरवान्वित करने वाली दुर्लभ शिल्प कला नई दिल्ली के संग्रहालय में से एक हैं।

बीकानेर संग्राहालय में जैन सरस्वती वाग्देवी की मूर्ति

बीकानेर संग्रहालय में भी पल्लू गाँव से प्राप्त मूर्ति सफेद संगमरमर की बनी जैन सरस्वती वाग्देवी की हैं। मुख्य मूर्ति नई दिल्ली के संग्रहालय की मूर्ति से काफी समानता रखती हैं।किंतु दाहिने और पार्श्व भाग में परिचारिकाओं के ऊपर एक-एक लघु आकृति बनी हुई हैं। इस मूर्ति के दोनो ओर पार्श्व में अंलकृत संतभों और तोरण से सज्जित हैं। तोरण के शीर्ष भाग मे मंदिर के तीन आले वने हुये हैं। यह मूर्ति बहुत ही सुंदर हैं। ये दोनो जैन सरस्वती प्रतिमायें राजस्थान के मघ्यकाल की उतकृष्ट कृतियाँ हैं। यहाँ अनेक मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुये हैं लेकिन ये दोनो मूर्तियाँ शिल्पकला का अद्भुत नमूना हैं।

पुरातात्विक लिहाज से थेहड़ एक धरोहर है जिसकी खुदाई की जाए तो बहुत सी प्राचीन जानकारियां उपलब्ध हो सकती हैं। यदि इसके थेहड़ों का खनन किया जाएं तथा उनमें से प्राप्त वस्तुओं की आयु का आंकलन किया जाय तो थेहड़ों वाले इलाके प्राचीनता प्रकट होगी तथा इसके क्रमिक उत्थान पतन का ज्ञान हो सकेगा।

 

 

  • चालसेडोनी: एक प्रकार का चमकीला पारदर्शी बिल्लौर पत्थर जिसे स्फटिक कहा जाता हैं । इसमें अनेक रंग, प्रकार और आकार पाये जाते हैं।
  • कार्नीलियन: लाल से भूरे के बीच के वर्ण का स्फटिक, जो कि कुछ सख्त एवं गहरा होता है। जिसे इन्द्रगोप कहते हैं।
  • स्टीटाइट: एक नरम भारी सघन सिलखड़ी (टैल्क) की किस्म है जो एक साबुन की तरह लगता है और यह सिगड़ी, भट्ठी घर और मेज़ का ऊपरी भाग और गहने बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं।
संदर्भ :
      • Google search
      • wikipedia
      • rajasthan-state-archives-bikaner
      • http://www.nationalmusuemindia.gov.in/prodCollecions
      • https://www.rajasthanhistory.com/blog-detail/?pn=40
      • https://bhatakna.wordpress.com/2014/06/16/kalibangan-harappan-site-in-india/
      • जगदीश मनीराम साहू (निवासी ढाणी छिपोलाइ )

 

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