मंदिर क्यों जाते हैं ?

मंदिर जाने के वैज्ञानिक कारण

सनातन परंपरा में हर काम की शुरुआत ईश्वर को याद करने से होती है और मंदिर जाना भी इसका एक अहम हिस्सा है। इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। यदि हम किसी भी रिवाज का अंधानुकरण करते हैं तो समय के साथ तथ्य का सार गायब हो जाता हैं और कई मामलों में यही हुआ है। हमारे ऋर्षि मनीषि वैज्ञानिक थे। उन्होने प्रकृति, विज्ञान और अध्यात्म का अनोखा समन्वय कर के हमारे दैनिक जीवन में पिरो दिया था। समय के साथ यह विज्ञान एक धार्मिक संस्कार बन कर रह गया। इन बातो का रहस्य जाने बिना ही हम सब पीढ़ी दर पीढ़ी इसे करते आ रहे हैं। आइए जानें कि हमारे प्राचीन ज्ञान ने हमारे जीवन को एक नई दिशा देने के लिए कैसे बुद्धिमानी से विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक साथ जोड़ा।

वैदिक मंदिरों की संरचना:

सबसे पहले, यह देखना होगा कि वैदिक काल में मंदिर क्यों और कैसे बनाए गए थे?

पूरे भारत में विभिन्न प्रकार,  आकार और स्थानों पर हजारों मंदिर हैं, लेकिन वे सभी वैदिक तरीके से बने हुये हैं, यह नहीं माना जा सकता है। वैदिक तरीके से मंदिर ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ सकारात्मक ऊर्जा उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के चुंबकीय और विद्युत तरंग वितरण से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता हैं कि मंदिर कहाँ स्थित हैं – चाहे फिर वह कस्बे, गाँव या शहर के बाहरी इलाके में, या किसी निवास स्थान, बाजार  के बीच में या यहाँ तक कि एक पहाड़ी के ऊपर भी हो सकता हैं।

एक बार स्थान का चयन करने के बाद, मुख्य मूर्ति के स्थान का चयन किया जाता था।  मंदिर का मुख्य केंद्र ‘गर्भगृह’ या ‘मूलस्थानम’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ मुख्य देवता की मूर्ति रखी जाती है। यह मंदिर का वह मुख्य केंद्र है जहाँ पृथ्वी की चुंबकीय तरंगें अधिकतम पाई जाती हैं। इसीलिये निर्माण के समय मुख्य मूर्ति के नीचे वैदिक लिपि में लिखे मंत्रों वाली तांबे की पट्टी को गाड़ा जाता था। यह एक सर्वविदित तथ्य हैं कि तांबे की पट्टी पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों को अवशोषित कर के आसपास के वातावरण में प्रसारित करती है। गर्भगृह को तीन तरफ से बंद किया गया था, जिससे ऊर्जाओं को नियंत्रित करके उनके प्रभाव को बढ़ाया जा सके।

मानव शरीर में पांच इंद्रियों (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, गंध और स्वाद) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इन इंद्रियों का मंदिर जाने से गहरा संबंध हैं, जैसे ही हम मंदिर में पैर रखते हैं, ये पाँचों इंद्रियाँ सक्रिय हो जाती हैं।

यह कैसे होता है? आइए देखते हैं कि…

1. श्रोत्रेन्द्रिय या श्रवण भाव:

मंदिर में प्रवेश करने के बाद हम सबसे पहले घंटी बजाते हैं। जिस क्षेत्र में घंटी लगाई जाती है उसे मंदिर का ‘मूलस्थान’ कहा जाता है। घंटियों की बनावट विशेष होती हैं जिससे इनसे निकलने वाली ध्वनि हमारे दिमाग के दाएं और बाएं दोनों तरफ एकरूपता पैदा करती है। घंटी की यह ध्वनि सात सेकंड के लिए हमारे भीतर गूंजती है और ये सात सेकंड शरीर के सात आरोग्य केंद्रों को क्रियाशील करने के लिए पर्याप्त हैं। घंटी की ध्वनी और सामुहिक मंत्रों का जाप, पूजा करने वाले को एक मंत्रमुग्ध कर देता है और उसके मन को भटकने से रोकता है। इस से लोगों को अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भूलने में मदद मिलती है और चाहे कुछ समय के लिए ही सही उन्हें तनाव से छुटकारा मिलता है।

2. चक्षुेन्द्रिया (दर्शन इंद्रिया) या दृश्य भाव:

मंदिर का गर्भगृह जहां भगवान की मूर्ति होती है उस जगह आमतौर पर थोड़ा अंधेरा होता है और उनके सामने केवल आरती के लिए कपूर जल रहा होता है। इस अंधेरे क्षेत्र में ये ही एकमात्र रौशनी होती है जो अंधेरे में प्रकाश भर देती है। ऐसे में हमारी दर्शन इंद्रिय या देखने की क्षमता अधिक तीव्र हो जाती है।

3. स्पर्शेन्द्रिया या स्पर्श भाव:

गर्भगृह तीन तरफ से बंद होता है, इसलिए ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। जो दीपक जलाया जाता है, वह ऊष्मा ऊर्जा प्रदान करता है और यह गर्भगृह के अंदर प्रकाश भी प्रदान करता है।  आरती के बाद जब हम ईश्वर का आरती के रूप में आशीर्वाद लेते हैं तो हम कपूर या दीये की आरती पर अपना हाथ घुमाते हैं। इसके बाद हम अपने हाथो को आंखों से लगाते हैं। कर्पूर यह कीट-नाशक हैं, इस से वातावरण तो शुद्ध होता हैं। जब हम आंख पर गर्म हाथ रखते हैं तो रोजमर्रा के संपर्क में आने वाले कीटाणुओं के नाश के साथ ही हमारी स्पर्श इंद्रिया भी क्रियाशील हो जाती है।

4. घ्राणेन्द्रिया या सूंघने का भाव:

हम भगवान को फूल चढ़ाते हैं। फूलों से निकलने वाली खुशबू, जलते हुए कपूर की महक और मंदिर में जलाई जाने वाली अगरबत्तियों से निकलने वाली खुशबू, ये सब एक रासायनिक ऊर्जा छोड़ते हैं जो हमारी गंध इंद्रिय या सूंघने की इंद्रिय को भी सक्रिय कर देती हैं। यह नाक और गले के रास्ते को साफ करने में भी मदद करता है।

5. रसेंद्रिय या रससंवेदी भाव:

तांबे की थाली और अन्य बर्तन जिनका उपयोग मूर्ति के स्नान आदि के लिए किया जाता है, वे चुंबकीय ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। तीर्थम या चरणामृत यह पवित्र जल, इलायची, कर्पूर (बेंजोइन), केसर, तुलसी, लौंग और कई अन्य जड़ी बूटियों का एक संयोजन है। जब इस पवित्र जल से मूर्ति को नहलाया जाता है, तो यह जल चुंबकीय अवयवों के साथ मिल कर पानी में ऊर्जा भर देता हैं। इस प्रकार इसका औषधीय महत्व बढ़ जाता है। इस पवित्र जल के तीन चम्मच प्रत्येक भक्त को वितरित किए जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखा पानी या तरल पदार्थ हमारे शरीर के तीन दोषों (कफ, वात, पित्त) को संतुलित करने में मदद करता है। लौंग दांतों की सड़न से बचाता है, केसर और तुलसी आम सर्दी और खांसी, इलायची और कर्पूर मुँह की दुर्गंध दूर करता है। यह जल अत्यधिक ऊर्जावान होने के साथ ही एक बहुत अच्छा रक्त शोधक भी है। यह एक चुबंक चिकित्सा (मैग्नेटो-थेरेपी) हैं, जिस से हमारी रसेंद्रिय या स्वाद  महसूस करने वाली क्षमता भी सक्रिय हो जाती है। यही कारण है कि सभी को यह तीर्थम ‘प्रसाद’ के रूप में दिया जाता है।

6. मंदिर में नंगे पैर क्यों जाते हैं:

मंदिर की जमीन को सकारात्मक ऊर्जा का वाहक माना जाता है और यह ऊर्जा भक्तों में उनके पैर के जरिए ही प्रवेश कर सकती है। इसलिए हम मंदिर में नंगे पैर जाते हैं। वैज्ञानिक रूप से, यह सकारात्मक ऊर्जा है जो हम सभी के स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है। चलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और दिन में एक या दो बार नंगे पैर चलना भी रक्त प्रवाह को बढ़ाता है क्योंकि पैरों में कई एक्यूप्रेशर बिंदु होते हैं।

7. मंदिर की परिक्रमा क्यों की जाती हैं:

नियमित रूप से, पूजा के बाद, मुख्य मूर्ति के चारों ओर दक्षिणावर्त घूमने से हमारा शरीर इन चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करता है। इस से वैज्ञानिक रूप से, हम में सकारात्मक ऊर्जा का उदय होता हैं और हमें पूजा का अधिकतम लाभ मिलता है।

8. पुरुषों को कमीज पहनने की अनुमति क्यों नहीं हैं:

जब मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, बंद हुई ऊर्जा तेजी से बाहर प्रवाहित होती हैं जिससे वहां खड़े लोगों पर सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव पड़ता है और जो जल लोगो पर छिड़का जाता हैं वह भी सभी को ऊर्जा प्रदान करता है। इसीलिए कुछ मंदिरों में पुरुषों का कमीज पहन कर जाना निषेध हैं और महिलाओं से अनुरोध किया जाता हैं कि वे मंदिर की यात्रा के दौरान अधिक गहने पहनें। जिस से गहनों (धातु) के माध्यम से महिलाओं द्वारा सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित किया जा सके।

नवनिर्मित गहनों, ऑटोमोबाइल या ऐसी किसी भी अन्य चीजों को मूर्ति के चरणों में छोड़ना और फिर उनके आशीर्वाद के साथ उन्हें पहनना या उनका उपयोग करना एक बहुत ही आम बात है। यह केवल वहाँ की सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने के लिए किया जाता है।

शास्त्रो के विधान के अनुसार दिन में दो बार मंदिर अवश्य जाना चाहिये। हम इन नियमित मंदिर की यात्राओं से दिन भर के काम से खोई हुई ऊर्जा को फिर से प्राप्त या ताज़ा कर सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।

जब हमारे बुजुर्ग पारंपरिक अनुष्ठानों को करने का सुझाव देते हैं, तो उनमें से सभी अनुष्ठान हमेशा अंधविश्वास पर टीके नहीं होते हैं। हो सकता है कि कुछ मामलों में वे अज्ञानता के कारण सीमा पार कर देते हैं; जैसे कि कई गंभीर बीमारियों को देवताओं द्वारा ठीक किया जा सकता है, इत्यादि।

हमारी प्रथाएं कपोल कल्पित नहीं हैं। इन सभी अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को केवल एक व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं, बल्कि कई ऋषियों और मनीषियों द्वारा अच्छी तरह से शोध, अध्ययन और वैज्ञानिकता प्रमाणित होने के बाद ही, एक अच्छे स्वस्थ जीवन का नेतृत्व करने के लिए दैनिक जीवन में सम्मिलित किया गया हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म के मिलने से, न जानने पर भी हमारा हित ही साध्य होता हैं। हिंदू धर्म से जुड़ी हर मान्यता के पीछे छिपी हमारी भलाई के लिए एक वैज्ञानिक कारण है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन पर शोध करें और इसके पीछे छिपे हुये कारणो को जानें।

साभार:

Web search

Kuldevi site: https://www.facebook.com/ShriBrahmani/Brahmani temples in India

https://www.quora.com/What-is-the-scientific-reason-behind-visiting-temples/answer/Premsai-Reddy

Scientific reasons for visiting the temple

In the Sanatan tradition, every work begins with an invocation to God and visiting a temple.  There is a scientific reason behind this. If we follow any custom blindly then the essence of the fact will disappear in due course of time and this has what has happened in many cases. Our Rishies and Manishies  were scientists of life and they blended a unique co-ordination of nature, science and spirituality into our daily lives. Over time, this science became a religious ritual. Without knowing the real meaning behind them, we have been following these customs from generation and passing them on to the next generation. It is now time to decipher this mystery and uncover the truth.

Let us find out how our ancient wisdom intelligently combined science and spirituality together to give a new direction to our lives.

Structure of the Vedic Temples:

Firstly, one has to see why and how the temples were built in the Vedic times:

There are thousands of temples all over India in different sizes, shapes and locations but not all of them are considered to be built in the Vedic way.  Our sages built temples where the path of earth’s magnetic wave passed through densely. They made sure that the temple would absorb the positive energy which was abundantly available from the thrust of the magnetic and electric wave distribution of the Northern or Southern Pole. Then it did not matter where the temple was located – in the outskirts of a town, village or city, or in the middle of a dwelling place or even atop a hill.

Once the location was selected, they would see the core centre where earth’s magnetic waves were maximum.  The core center of a temple is known as ‘Garbhagriha’ or ‘Moolasthanam’, where the idol of the main deity is placed. Then, copper plates inscribed with Vedic scripts were buried beneath the main Idol.  It is a well known fact that copper absorbs the earth’s magnetic waves and radiates it to the surroundings. The Sanctum was covered on three sides which, in turn, increased the effect of all the energies.

The five senses (sight, hearing, touch, smell and taste) are considered to be the most important in a human body. There is a very strong connection between these senses and going to a temple. As soon as we set foot in a temple, these five senses become active.

How does it happen? Let’s see that…

 1, Shrotrendriya or the Auditory Sense:

The first thing that we do on entering a temple is ring the bell. The area where the bell is placed is called ‘moolasthanam’ of the temple. These bells are created in such a way that the sound emanating from them creates uniformity on both the right and the left side of our brains. This sound of the bell resonates in us for seven seconds and these seven seconds are enough to activate the seven healing centers of the body.  The ringing of the bell and the chanting of prayers takes the worshipper into a trance-like state, thus not preventing his mind from wandering. When this kind of worship is done in groups, it helps people forget their personal problems – at last for a while and thus relieves their stress.

2. Darshan indriya (chakshushendriya) or the Visual Sense:

The sanctum sanctorum of the temple where the idol of the main deity is situated is usually a little dark. Camphor is normally lit to do the Aarti. The darkness in this area is illuminated only by this light. In such a situation, our sense of vision or our ability to see becomes more acute.

3. Sparshendriya or the Tactile Sense:

Since the Sanctum is closed on three sides the effect of energy gets enhanced. The lamp that is lit radiates heat energy and also provides light inside the Sanctum. When we seek the blessings of God in the form of the Aarti, we rotate our hands over the lit lamp. After this, we touch our eyes with our hands. The light of the lamp purifies the environment, and when we place our warm hands on our eyes, we destroy the germs that come in contact with everyday. At the same time our tactile sense gets activated.

4. Ghranendriya or the Olfactory Sense:

We offer flowers to the Lord. The fragrance from flowers, the smell of burning camphor and the fragrance from the incense sticks lit in the temple, all release a chemical energy that activates our sense of smell.  This helps to clear the channels of the nose and throat.

5. Rasendriya or the Gustatory sense:

The copper plates and other utensils which are used for the idol’s bath, etc… absorb magnetic energy. The Holy water called teertham or charanamrit, is a concoction of cardamom, karpuram (Benzoin), saffron, tulsi or holy basil, clove and many other herbs. When the idol is bathed in this holy water, it gets charged with magnetic radiations, thus increasing its medicinal value. Three spoons of this holy water is distributed to each of the devotees. According to Ayurveda, water or liquids placed in a copper vessel helps in balancing the three doshas (kapha, vata, pitta) of our body. Clove protects tooth decay, saffron & tulsi   protect from common cold and cough, cardamom and  karpuram act as mouth fresheners. It has been proved that since this teertham is highly energised, it is a very good blood purifier. It is this magneto-therapy which activates our gustatory sense. This is the reason for giving everyone this teertham as a ‘prasadam’.

6. Why go to the temple barefoot:

The ground of the temple is considered a carrier of positive energy and this energy can enter a devotee only through his feet. Hence, we go barefoot inside a temple. Scientifically, this is the positive energy that we all require to have a healthy life. Walking is good for health and going barefoot once or twice a day also increases blood flow since there are many acupressure points in the feet.

There is also a practical reason for this. We go to many places wearing footwear. It is not right to take the outside dirt or negativity inside a temple which is a holy place of worship.

7. The reason for parikrama or circumambulation of the temple:

After worship, we orbit or walk clockwise around the Main Idol. This action allows our body to absorb the beamed magnetic waves. Scientifically, positive energy rises in us through this and we get the maximum benefit of worship.

8. The reason why men are not allowed to wear a shirt:

When the temple doors open, the positive energy gushes out onto the people standing there. The water that is sprinkled onto the assemblages passes on the energy to all. That’s why a few temples prohibit men from wearing shirts and request women to wear more ornaments during their temple visits. It is through these jewels (metal) that positive energy is absorbed by the women.

It is a very common practice to leave newly purchased jewels, automobiles or any other such things at an idol’s feet and then wear or use them with His blessings. This is done only to absorb the positive energy vibrating there.

According to the Scriptures, a temple must be visited twice a day. We can regain or refresh the energy lost in a day’s work and remain healthy by these regular visits.

Our practices are not imaginary. All these rituals and customs have been incorporated into our daily lives so that man can lead a good healthy life. They were prescribed only after being well researched, studied and scientifically certified by not just one person but by many Rishis and Manishis. hus we can see that both science and technology were camouflaged in the daily practise of visiting temples.

When our elders suggest doing something as a part of traditional rituals, not all of them are always superstitious. Maybe in some cases they do go overboard due to ignorance; like when they believe that many serious diseases can be cured by deities. There is a scientific reason and the interest for our well being hidden behind every belief related to the Hindu Religion. It is our responsibility to do some research and discover the reason behind it.

References:

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Kuldevi site: https://www.facebook.com/ShriBrahmani/Brahmani temples in India

https://www.quora.com/What-is-the-scientific-reason-behind-visiting-temples/answer/Premsai-Reddy

Temple Location

Mata Ji Mandir Road, Pallu, Rajasthan
Pincode-335524.India

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