Narasimhi

नारसिंही

ऊँ श्याम-पक्ष ज्वाला जिव्हे,कराला दंष्ट्रे,

कालरात्री प्रत्यङ्गिरे। क्षां ह्रीं हुं फट।।

(रूपमंडन)

यह मंत्र कई बीज मंत्रों से बना है, जो माँ प्रत्यङ्गिरा के शक्तिशाली पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यह मंत्र नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए एक शक्तिशाली ढाल की तरह है।

नारसिंही को प्रत्यङ्गिरा, नारसिंहिका, दक्ष विनाशिनी और भैरव पत्नी के रूप में जाना जाता है। ‘नार ’का अर्थ है मानवी और सिंह का अर्थ है सिंह, इस प्रकार, नारसिंही या नारसिंहिका का मतलब होता हैं शेर और मानव का संयोजन, जो अच्छे और बुरे के संतुलन का प्रतीक है। शिव के शरभ अवतार से जुड़ी होने के कारण, वे भगवान शिव और मां काली की संयुक्त विशेषताएं के साथ, शिव और शक्ति के मिलन का प्रतिनिधित्व करती है ।

नारसिंही विष्णु के समान नील वर्णी और उनके सिर पर सर्प की छतरी है। उनका मुख शेर का, लाल आंखे और माथे पर तीसरी आंख का सीधा निशान है। उनकी बाहर निकली हुई लाल रंग की जीभ, काली का प्रतिनिधित्व करती है। वह लाल साड़ी पहनती है और मानव मुंड़माला या भारी फूलों की माला से सुशोभित है। उनके घने बाल सिर पर खड़े हुये हैं और शिव की तरह ही अर्धचंद्र से सुशोभित एक रत्नजड़ित मुकुट हैं। उनका वाहन सिंह है और वे शरभेश्वर की सहचरी है।

चर्तुभुजी:

      • नारसिंही को जब चर्तुभुजी चित्रित किया जाता हैं, तब उनके चार हाथों में त्रिशूल, डमरू, नाग का फंदा और खोपड़ी होती है।
      • कभी-कभी विष्णु और शिवके समान शंख, चक्र, त्रिशूल और डमरू होता है।

टिप्पणी: हाथ में नागफास या कुंडलित सर्प यह अहंकार को नियन्त्रित करने और शिव की अलिप्तता जिस के कारण वे बेघर रहते हैं, का प्रतीक है।

नारसिंही का विभिन्न परंपराओं के साथ संबंध:

वैदिक परंपरा:

नारसिंही एक शक्तिशाली नारी-सिंह देवी है, जिनके अयाल के हिलने मात्र से ही ब्रह्मांड केतारामंडल में खलबली मच जाती है। वह नारी की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है और एक सीधी साधी देवी होने की प्रतिष्ठा रखती है। वह अपने भक्तों को बुरे काम का दंड़ देने और अच्छे कामों का आशीर्वाद देने की शक्ति रखती है।

‘प्रति’ शब्द का अर्थ है ‘उल्टा’ और ‘अंगिरस’ का अर्थ है ‘हमला करना’, इसलिए प्रत्यङ्गिरा का अर्थ हैं वह जो किसी भी काले जादू के हमलों को उलट देवे ऐसी देवी।

दक्षिण के मंदिरों में य़ह अथर्वण-भद्र-काली के रूप पूजी में जाती है, क्योंकि वह अथर्ववेद जिस में तंत्र-मंत्र विद्या का संयोजन और इलाज हैं की शासक देवी मानी जाती है। देवी प्रत्यङ्गिरा गुप्त मंत्रों, तंत्रों और यन्त्रों की रखवाली करती हैं, जिस से यह विद्या बुरे इरादों वाले लोगों के हाथों तक पहुँचने न पाये। मातृका के रूप में नारसिंहीं को एक स्वतंत्र देवी माना जाता है, अन्य मातृकाओं की तरह वे नरसिंह का नारी अवतार नहीं हैं। वैष्णववाद में नारसिंही को लक्ष्मी का एक रूप माना जाता है, जिसने उग्र नरसिंह को शांत किया था।

शक्ति परंपरा:

शक्तिवाद के अनुसार, वह गुह्य काली का एक रूप है, जो शिव और शक्ति की संयुक्त विनाशकारी शक्ति है। दुर्गा परंपरा में, वह पूर्ण चंडी है, जो ब्राह्मणों की उग्र विनाशकारी शक्ति है।

नारसिंही, ललिता-त्रिपुर सुंदरी की सेना की प्रमुख योद्धा देवी हैं जिन्हें शक्ति सेना कहा जाता है। आदि-पराशक्ति और भण्डासुर के बीच हुये युद्ध के दौरान, पराम्बा ने प्रत्यङ्गिरा से प्रसन्न हो कर उन्हे दो वरदान दिए:

      1. यदि कोई आपत्तिजनक उद्देश्यों के लिए भी इनका आह्वान करता है, तो प्रत्यङ्गिरा प्रसन्न हो कर अपने भक्त को अजेयता और निश्चित जीत का वर दे सकती है।
      2. एक बार उनके द्वारा दी गई सुरक्षा अजेय है और कोई भी देवता,यहाँ तक कि आदि पराशक्ति भी इसे नहीं पलट सकती।

क्षत्रिय योद्धा जाति के बीच नारसिंही या प्रत्यङ्गिरा एक बहुत ही परम लोकप्रिय देवी हैं। जिन्हें अक्सर रक्षात्मक और आक्रामक शक्ति के लिए पूजा जाता है।

रामायण:

रामायण में एक प्रसंग है: युद्ध के दौरान जब विभीषण को यह पता चला कि इंद्रजीत विजय पाने के लिये, देवी प्रत्यङ्गिरा से ‘अजेय’ वर पाने के लिए “निकुंभला यज्ञ” का पवित्र अनुष्ठान कर रहे हैं तो उन्होंने राम से कहा कि वे हनुमान और लक्ष्मण को यज्ञ रोकने के लिए भेजें, क्योंकि वे जानते थे कि इसे पूरा करने से इंद्रजीत अजेय हो जाएगा। राम की आज्ञा से उन लोगों ने जा कर यज्ञ को आधे में ही रोक दिया और इंद्रजीत की जीत की आशा अधूरी रह गई।

तंत्र-शास्त्र

तंत्र शास्त्र में देवी-देवताओं को शांत,क्रोधी,उग्र, भयावह और भयानक आदि रूपों में वर्गीकृत किया गया है। नरसिंहिका को एक भयावह और उग्र देवी के रूप में माना जाता है। दिखावे के लिये पूजा भक्ति करने वाले लोगों के लिए उनकी पूजा सख्त वर्जित है। अनिष्ट शक्तियों के प्रभाव को समाप्त करने और लोगों की भलाई के लिए, एक कुशल तांत्रिक गुरु के मार्गदर्शन में ही इनकी पूजा की जाती है।

तंत्र में वह श्री चक्र और भैरव के साथ अथर्वण-भद्र-काली के रूप में जुड़ी हुई है। वह भक्तों की रक्षा कर के, उन्हें सही रास्ते पर ले जाती है।

देवी पुराण

देवी पुराण में सप्त मातृकाओं का क्रम इस तरह बताया गया है: ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा। कभी-कभी चामुंडा के स्थान पर नारसिंही का भी उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानों पर नारसिंहिका सहित अष्टमातृका का भी वर्णन मिलता हैं।

मिस्र की पौराणिक देवी:

मिस्र की पौराणिक कथाओं की देवी ‘सेकमेट’ और प्रत्यङ्गिरा में काफी समानता है। ये दोनों महान योद्धा देवी हैं, जिनका शरीर आधा मानव और आधा शेर का हैं, एक साँप उन के सिर पर छतरी की तरह छाया करता हैं और आग जैसी दिखने वाली आभा मुख-मंड़ल के चारों ओर फैली हुई हैं।

आदि पराशक्ति का अवतार:

आदि पराशक्ति अवतार के कई अलग-अलग संस्करण हैं। कुछ निम्न हैं:

किंवदंती है कि प्राचीन काल में- प्रथ्यांगिरा और अंगिरस नामक दो ऋषि ध्यान कर रहे थे और उन्होंने एक मूल मंत्र के माध्यम से एक देवी की खोज की जो नामहीन थी। देवी ने ऋषियों को गौरवान्वित करने के लिये अपना नामकरण उनके नाम पर ‘प्रत्यङ्गिरा देवी’ किया।

मत्स्य पुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण:

शिव ने राक्षस अंधका का मुकाबला करने के लिए सात मातृकाएं बनाई थीं, क्योंकि अंधकासुर को वर था कि जैसे ही उसके रक्त की बूंद जमीन पर पड़ेगी वैसे ही रक्त की प्रत्येक बूंद से उसकी एक प्रतिलिपि तैयार हो जायेगी। मातृकाओं ने रक्त की बूंद को जमीन पर पड़ने के पहले ही पीना शुरू कर दिया और शिव को अंधकासुर को हराने में मदद की। युद्ध के बाद, मातृकाओं ने उद्दण्ड हो कर दुनिया के अन्य देवताओं, राक्षसों और लोगों को भस्म करना शुरू कर दिया। तब नरसिंह ने, सौम्य बत्तीस मातृकाओं के एक समूह को उत्पन्न किया और उन्होने भयानक, अग्नि की तरह क्रोधित सप्त मातृकाओं को शांत किया। भगवान नरसिंह ने मातृकाओं को आज्ञा दी कि वे संसार को नष्ट करने के बजाय इसकी रक्षा करें, जिस से मानव जाति मातृकाओं की पूजा करेगी।

मार्कंडेय पुराण और शिव पुराण:

त्रेता युग की शुरुआत में, विष्णु ने उद्दण्ड राजा हिरण्यकश्यप को मारने के लिए ‘नरसिंह’ का अवतार लिया। उसे मारने के बाद वे अपने गुस्से को रोक नहीं पाए और दुनिया को नष्ट करना शुरू कर दिया। उसे शांत करने के लिए भगवान शिव ‘शरभ’के रूप में आए,जो एक पक्षी-पशु-मानव का मिश्रण था। नरसिंह उनके जवाबी हमले के लिए दो मुखीय पक्षी ‘गंडभेरूंड’ बन गये। दोनों पक्षी दुनिया को आतंकित करते हुये, एक लंबे समय तक लड़ाई लड़ते रहे लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। यह देखकर, सरबेश्वर ने शिव के भैरव का भयंकर रूप धारण किया और अपनी तीसरी आँख से शक्ति का आह्वान किया। नारसिंही में विष्णु, शिव और शक्ति की संयुक्त शक्ति थी और वह उन सब से भी अधिक शक्तिशाली थी। उन्होने घोर गर्जना की जिससे शरभ और गंडभेरूंड घबरा गये और उन्होंने लड़ना बंद कर दिया। उसके बाद वे नरसिंह की गोद में बैठ गई, जिस से धीरे-धीरे नरसिंह का क्रोध शांत हो गया।

शरभ अवतार:

हिन्दू अवधारणा के अनुसार शिवजी का शरभ अवतार सिंह और पक्षी दोनों ही के सामान गुणों से युक्त माना गया हैं। शिवजी का शरभ अवतार शरभेश्वर, सर्बेश्वरमुर्ति और शर्भेश्वरमुर्ती के नाम से भी प्रसिद्ध है। विभिन्न पुराणों में शरभ अवतार के रूप का अलग-अलग वर्णन हैं। संक्षेप में शरभ पक्षी के शरीर का रंग सुनहरा है। उनका शेर का मुख, पक्षी के सदृश्य दो मजबूत पंख, दो लाल आँखें, पैने लंबे नाख़ून, आठ पैर, कठोर जबड़े के किनारों में स्थित आठ गजदंत हैं जो और भी प्रलयंकारी प्रतीत होते है। उनके सिर पर जटाओं से युक्त केशों के समूह पर मुकुट हैं और एक बड़ी पूछ है। उनकी भव्य काया हैं और वे बहुत ही तेजी से गमन करते हैं जिस से एक तेज ध्वनी उत्पन्न होती है। किंवदंती है कि शरभ शेर और हाथी से भी शक्तिशाली और शेर को मारने में सक्षम है।

शरभ का धड़ पुरुष का, निचला हिस्सा एक शेर की तरह और कंधे पक्षी की तरह हैं। जनश्रुति है कि हिरण्यकश्यप के मारने के पश्चात् भी जब नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तब शरभ उन्हें अपने पंजे में दबोच कर आकाश में ले उड़ा। इसीलिये शरभ को अपने मानव रूप में नरसिंह को हाथ में ले जाते हुए दिखाया जाता हैं।

गंडभेरुंड अवतार:

हिंदू पौराणिक कथाओं में गंडभेरुंड को बरुंडा के नाम से भी जाना जाता है, जो बाज और पक्षी का मिश्रण है। वह जादुई शक्तियों वाला दो सिर वाला पक्षी है, जिसका धड़ गरुड़ का हैं और वे अपनी चोंच और पंजे में एक हाथी को पकड़े हुए दिखाई देते है। उनमें विनाश की अंतिम शक्तियों से निपटने के लिए अपार शक्ति है। बेलूर और कर्नाटक के कई मंदिरों में, गंडभेरुंड पक्षी को विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है और उन्हे दक्षिण में शैव मंदिरों में उत्सव की मूर्तियों के रूप में देखा जा सकता है।

हिरण्यकश्यप को मारने के बाद, भगवान विष्णु क्रोधित हो गए और उन्होने जो कुछ भी रास्ते में आ रहा था, उसे नष्ट करना शुरू कर दिया। उन्हे शांत करने के लिए, भगवान शिव ने, जो नारायण के प्रिय थे, शरभ अवतार के रूप में अवतार लिया। लेकिन नरसिंह शांत होने के बजाय और अधिक क्रोधित हो गये और शरभ से लड़ने के लिये गंडभेरुंड के रूप में अवतार ले लिया। 18 दिनों तक उन दोनों में धोर संघर्ष हुआ। तब शरभ ने प्रत्यङ्गिरा को अवतरित किया और उन्होने आकर नरसिंह को शांत किया।

राजकीय प्रतीक

महान इतिहासकारों के अनुसार, गंडभेरुंड का पहली बार विजयनगर के सिक्कों पर इस्तेमाल किया गया था। तब से उन्हे कई अन्य हिंदू राजवंशों ने अपने सिक्कों में प्रतीक के रूप में उपयोग किया। मदुरै क्षेत्र में कई सिक्के पाए गए, उन पर दो सिर वाला पक्षी जिसकी चोंच में सांप हैं की आकृति का स्पष्ट देखा जा सकता है। गंडभेरुंड मैसूर की रियासत का शाही चिंह है और आज यह कर्नाटक राज्य सरकार का आधिकारिक प्रतीक हैं।

पाठांतर-1

ऊँ शर्भेश्वरा/शर्बेश्वरा शांता कारिणी विद्महे,

उग्र नरसिंह शक्ति स्वरूपिणी धीमहि।

तन्नो श्री प्रत्यङ्गिरे देवी प्रचोदयात्।।

पाठांतर-2

ऊँ अपराजिताये विद्महे,

प्रत्यङ्गीराये धीमहि।

तन्नो उग्रा प्रचोदयात्।।

पाठांतर-3

ऊँ प्रत्यङ्गीराये विद्महे,

शत्रुनिशुथिन्ये धीमहि।

तन्नो देवी प्रचोदयात्।।

संदर्भ:

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

Saptamatrka – Part Four

http://www.blog.vedicfolks.com/ashta-matrika-gayatri-mantra/

www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

www. templepurohit.com

https://en.wikipedia.org/wiki/Pratyangira

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Kamat’s Potpourri: Pictures from Indian Mythology – Ganda

नारसिंही

ऊँ श्याम-पक्ष ज्वाला जिव्हे,कराला दंष्ट्रे,

कालरात्री प्रत्यङ्गिरे। क्षां ह्रीं हुं फट।।

(रूपमंडन)

यह मंत्र कई बीज मंत्रों से बना है, जो माँ प्रत्यङ्गिरा के शक्तिशाली पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यह मंत्र नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए एक शक्तिशाली ढाल की तरह है।

नारसिंही को प्रत्यङ्गिरा, नारसिंहिका, दक्ष विनाशिनी और भैरव पत्नी के रूप में जाना जाता है। ‘नार ’का अर्थ है मानवी और सिंह का अर्थ है सिंह, इस प्रकार, नारसिंही या नारसिंहिका का मतलब होता हैं शेर और मानव का संयोजन, जो अच्छे और बुरे के संतुलन का प्रतीक है। शिव के शरभ अवतार से जुड़ी होने के कारण, वे भगवान शिव और मां काली की संयुक्त विशेषताएं के साथ, शिव और शक्ति के मिलन का प्रतिनिधित्व करती है ।

नारसिंही विष्णु के समान नील वर्णी और उनके सिर पर सर्प की छतरी है। उनका मुख शेर का, लाल आंखे और माथे पर तीसरी आंख का सीधा निशान है। उनकी बाहर निकली हुई लाल रंग की जीभ, काली का प्रतिनिधित्व करती है। वह लाल साड़ी पहनती है और मानव मुंड़माला या भारी फूलों की माला से सुशोभित है। उनके घने बाल सिर पर खड़े हुये हैं और शिव की तरह ही अर्धचंद्र से सुशोभित एक रत्नजड़ित मुकुट हैं। उनका वाहन सिंह है और वे शरभेश्वर की सहचरी है।

चर्तुभुजी:

      • नारसिंही को जब चर्तुभुजी चित्रित किया जाता हैं, तब उनके चार हाथों में त्रिशूल, डमरू, नाग का फंदा और खोपड़ी होती है।
      • कभी-कभी विष्णु और शिवके समान शंख, चक्र, त्रिशूल और डमरू होता है।

टिप्पणी: हाथ में नागफास या कुंडलित सर्प यह अहंकार को नियन्त्रित करने और शिव की अलिप्तता जिस के कारण वे बेघर रहते हैं, का प्रतीक है।

नारसिंही का विभिन्न परंपराओं के साथ संबंध:

वैदिक परंपरा:

नारसिंही एक शक्तिशाली नारी-सिंह देवी है, जिनके अयाल के हिलने मात्र से ही ब्रह्मांड केतारामंडल में खलबली मच जाती है। वह नारी की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है और एक सीधी साधी देवी होने की प्रतिष्ठा रखती है। वह अपने भक्तों को बुरे काम का दंड़ देने और अच्छे कामों का आशीर्वाद देने की शक्ति रखती है।

‘प्रति’ शब्द का अर्थ है ‘उल्टा’ और ‘अंगिरस’ का अर्थ है ‘हमला करना’, इसलिए प्रत्यङ्गिरा का अर्थ हैं वह जो किसी भी काले जादू के हमलों को उलट देवे ऐसी देवी।

दक्षिण के मंदिरों में य़ह अथर्वण-भद्र-काली के रूप पूजी में जाती है, क्योंकि वह अथर्ववेद जिस में तंत्र-मंत्र विद्या का संयोजन और इलाज हैं की शासक देवी मानी जाती है। देवी प्रत्यङ्गिरा गुप्त मंत्रों, तंत्रों और यन्त्रों की रखवाली करती हैं, जिस से यह विद्या बुरे इरादों वाले लोगों के हाथों तक पहुँचने न पाये। मातृका के रूप में नारसिंहीं को एक स्वतंत्र देवी माना जाता है, अन्य मातृकाओं की तरह वे नरसिंह का नारी अवतार नहीं हैं। वैष्णववाद में नारसिंही को लक्ष्मी का एक रूप माना जाता है, जिसने उग्र नरसिंह को शांत किया था।

शक्ति परंपरा:

शक्तिवाद के अनुसार, वह गुह्य काली का एक रूप है, जो शिव और शक्ति की संयुक्त विनाशकारी शक्ति है। दुर्गा परंपरा में, वह पूर्ण चंडी है, जो ब्राह्मणों की उग्र विनाशकारी शक्ति है।

नारसिंही, ललिता-त्रिपुर सुंदरी की सेना की प्रमुख योद्धा देवी हैं जिन्हें शक्ति सेना कहा जाता है। आदि-पराशक्ति और भण्डासुर के बीच हुये युद्ध के दौरान, पराम्बा ने प्रत्यङ्गिरा से प्रसन्न हो कर उन्हे दो वरदान दिए:

      1. यदि कोई आपत्तिजनक उद्देश्यों के लिए भी इनका आह्वान करता है, तो प्रत्यङ्गिरा प्रसन्न हो कर अपने भक्त को अजेयता और निश्चित जीत का वर दे सकती है।
      2. एक बार उनके द्वारा दी गई सुरक्षा अजेय है और कोई भी देवता,यहाँ तक कि आदि पराशक्ति भी इसे नहीं पलट सकती।

क्षत्रिय योद्धा जाति के बीच नारसिंही या प्रत्यङ्गिरा एक बहुत ही परम लोकप्रिय देवी हैं। जिन्हें अक्सर रक्षात्मक और आक्रामक शक्ति के लिए पूजा जाता है।

रामायण:

रामायण में एक प्रसंग है: युद्ध के दौरान जब विभीषण को यह पता चला कि इंद्रजीत विजय पाने के लिये, देवी प्रत्यङ्गिरा से ‘अजेय’ वर पाने के लिए “निकुंभला यज्ञ” का पवित्र अनुष्ठान कर रहे हैं तो उन्होंने राम से कहा कि वे हनुमान और लक्ष्मण को यज्ञ रोकने के लिए भेजें, क्योंकि वे जानते थे कि इसे पूरा करने से इंद्रजीत अजेय हो जाएगा। राम की आज्ञा से उन लोगों ने जा कर यज्ञ को आधे में ही रोक दिया और इंद्रजीत की जीत की आशा अधूरी रह गई।

तंत्र-शास्त्र

तंत्र शास्त्र में देवी-देवताओं को शांत,क्रोधी,उग्र, भयावह और भयानक आदि रूपों में वर्गीकृत किया गया है। नरसिंहिका को एक भयावह और उग्र देवी के रूप में माना जाता है। दिखावे के लिये पूजा भक्ति करने वाले लोगों के लिए उनकी पूजा सख्त वर्जित है। अनिष्ट शक्तियों के प्रभाव को समाप्त करने और लोगों की भलाई के लिए, एक कुशल तांत्रिक गुरु के मार्गदर्शन में ही इनकी पूजा की जाती है।

तंत्र में वह श्री चक्र और भैरव के साथ अथर्वण-भद्र-काली के रूप में जुड़ी हुई है। वह भक्तों की रक्षा कर के, उन्हें सही रास्ते पर ले जाती है।

देवी पुराण

देवी पुराण में सप्त मातृकाओं का क्रम इस तरह बताया गया है: ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा। कभी-कभी चामुंडा के स्थान पर नारसिंही का भी उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानों पर नारसिंहिका सहित अष्टमातृका का भी वर्णन मिलता हैं।

मिस्र की पौराणिक देवी:

मिस्र की पौराणिक कथाओं की देवी ‘सेकमेट’ और प्रत्यङ्गिरा में काफी समानता है। ये दोनों महान योद्धा देवी हैं, जिनका शरीर आधा मानव और आधा शेर का हैं, एक साँप उन के सिर पर छतरी की तरह छाया करता हैं और आग जैसी दिखने वाली आभा मुख-मंड़ल के चारों ओर फैली हुई हैं।

आदि पराशक्ति का अवतार:

आदि पराशक्ति अवतार के कई अलग-अलग संस्करण हैं। कुछ निम्न हैं:

किंवदंती है कि प्राचीन काल में- प्रथ्यांगिरा और अंगिरस नामक दो ऋषि ध्यान कर रहे थे और उन्होंने एक मूल मंत्र के माध्यम से एक देवी की खोज की जो नामहीन थी। देवी ने ऋषियों को गौरवान्वित करने के लिये अपना नामकरण उनके नाम पर ‘प्रत्यङ्गिरा देवी’ किया।

मत्स्य पुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण:

शिव ने राक्षस अंधका का मुकाबला करने के लिए सात मातृकाएं बनाई थीं, क्योंकि अंधकासुर को वर था कि जैसे ही उसके रक्त की बूंद जमीन पर पड़ेगी वैसे ही रक्त की प्रत्येक बूंद से उसकी एक प्रतिलिपि तैयार हो जायेगी। मातृकाओं ने रक्त की बूंद को जमीन पर पड़ने के पहले ही पीना शुरू कर दिया और शिव को अंधकासुर को हराने में मदद की। युद्ध के बाद, मातृकाओं ने उद्दण्ड हो कर दुनिया के अन्य देवताओं, राक्षसों और लोगों को भस्म करना शुरू कर दिया। तब नरसिंह ने, सौम्य बत्तीस मातृकाओं के एक समूह को उत्पन्न किया और उन्होने भयानक, अग्नि की तरह क्रोधित सप्त मातृकाओं को शांत किया। भगवान नरसिंह ने मातृकाओं को आज्ञा दी कि वे संसार को नष्ट करने के बजाय इसकी रक्षा करें, जिस से मानव जाति मातृकाओं की पूजा करेगी।

मार्कंडेय पुराण और शिव पुराण:

त्रेता युग की शुरुआत में, विष्णु ने उद्दण्ड राजा हिरण्यकश्यप को मारने के लिए ‘नरसिंह’ का अवतार लिया। उसे मारने के बाद वे अपने गुस्से को रोक नहीं पाए और दुनिया को नष्ट करना शुरू कर दिया। उसे शांत करने के लिए भगवान शिव ‘शरभ’के रूप में आए,जो एक पक्षी-पशु-मानव का मिश्रण था। नरसिंह उनके जवाबी हमले के लिए दो मुखीय पक्षी ‘गंडभेरूंड’ बन गये। दोनों पक्षी दुनिया को आतंकित करते हुये, एक लंबे समय तक लड़ाई लड़ते रहे लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। यह देखकर, सरबेश्वर ने शिव के भैरव का भयंकर रूप धारण किया और अपनी तीसरी आँख से शक्ति का आह्वान किया। नारसिंही में विष्णु, शिव और शक्ति की संयुक्त शक्ति थी और वह उन सब से भी अधिक शक्तिशाली थी। उन्होने घोर गर्जना की जिससे शरभ और गंडभेरूंड घबरा गये और उन्होंने लड़ना बंद कर दिया। उसके बाद वे नरसिंह की गोद में बैठ गई, जिस से धीरे-धीरे नरसिंह का क्रोध शांत हो गया।

शरभ अवतार:

हिन्दू अवधारणा के अनुसार शिवजी का शरभ अवतार सिंह और पक्षी दोनों ही के सामान गुणों से युक्त माना गया हैं। शिवजी का शरभ अवतार शरभेश्वर, सर्बेश्वरमुर्ति और शर्भेश्वरमुर्ती के नाम से भी प्रसिद्ध है। विभिन्न पुराणों में शरभ अवतार के रूप का अलग-अलग वर्णन हैं। संक्षेप में शरभ पक्षी के शरीर का रंग सुनहरा है। उनका शेर का मुख, पक्षी के सदृश्य दो मजबूत पंख, दो लाल आँखें, पैने लंबे नाख़ून, आठ पैर, कठोर जबड़े के किनारों में स्थित आठ गजदंत हैं जो और भी प्रलयंकारी प्रतीत होते है। उनके सिर पर जटाओं से युक्त केशों के समूह पर मुकुट हैं और एक बड़ी पूछ है। उनकी भव्य काया हैं और वे बहुत ही तेजी से गमन करते हैं जिस से एक तेज ध्वनी उत्पन्न होती है। किंवदंती है कि शरभ शेर और हाथी से भी शक्तिशाली और शेर को मारने में सक्षम है।

शरभ का धड़ पुरुष का, निचला हिस्सा एक शेर की तरह और कंधे पक्षी की तरह हैं। जनश्रुति है कि हिरण्यकश्यप के मारने के पश्चात् भी जब नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तब शरभ उन्हें अपने पंजे में दबोच कर आकाश में ले उड़ा। इसीलिये शरभ को अपने मानव रूप में नरसिंह को हाथ में ले जाते हुए दिखाया जाता हैं।

गंडभेरुंड अवतार:

हिंदू पौराणिक कथाओं में गंडभेरुंड को बरुंडा के नाम से भी जाना जाता है, जो बाज और पक्षी का मिश्रण है। वह जादुई शक्तियों वाला दो सिर वाला पक्षी है, जिसका धड़ गरुड़ का हैं और वे अपनी चोंच और पंजे में एक हाथी को पकड़े हुए दिखाई देते है। उनमें विनाश की अंतिम शक्तियों से निपटने के लिए अपार शक्ति है। बेलूर और कर्नाटक के कई मंदिरों में, गंडभेरुंड पक्षी को विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है और उन्हे दक्षिण में शैव मंदिरों में उत्सव की मूर्तियों के रूप में देखा जा सकता है।

हिरण्यकश्यप को मारने के बाद, भगवान विष्णु क्रोधित हो गए और उन्होने जो कुछ भी रास्ते में आ रहा था, उसे नष्ट करना शुरू कर दिया। उन्हे शांत करने के लिए, भगवान शिव ने, जो नारायण के प्रिय थे, शरभ अवतार के रूप में अवतार लिया। लेकिन नरसिंह शांत होने के बजाय और अधिक क्रोधित हो गये और शरभ से लड़ने के लिये गंडभेरुंड के रूप में अवतार ले लिया। 18 दिनों तक उन दोनों में धोर संघर्ष हुआ। तब शरभ ने प्रत्यङ्गिरा को अवतरित किया और उन्होने आकर नरसिंह को शांत किया।

राजकीय प्रतीक

महान इतिहासकारों के अनुसार, गंडभेरुंड का पहली बार विजयनगर के सिक्कों पर इस्तेमाल किया गया था। तब से उन्हे कई अन्य हिंदू राजवंशों ने अपने सिक्कों में प्रतीक के रूप में उपयोग किया। मदुरै क्षेत्र में कई सिक्के पाए गए, उन पर दो सिर वाला पक्षी जिसकी चोंच में सांप हैं की आकृति का स्पष्ट देखा जा सकता है। गंडभेरुंड मैसूर की रियासत का शाही चिंह है और आज यह कर्नाटक राज्य सरकार का आधिकारिक प्रतीक हैं।

पाठांतर-1

ऊँ शर्भेश्वरा/शर्बेश्वरा शांता कारिणी विद्महे,

उग्र नरसिंह शक्ति स्वरूपिणी धीमहि।

तन्नो श्री प्रत्यङ्गिरे देवी प्रचोदयात्।।

पाठांतर-2

ऊँ अपराजिताये विद्महे,

प्रत्यङ्गीराये धीमहि।

तन्नो उग्रा प्रचोदयात्।।

पाठांतर-3

ऊँ प्रत्यङ्गीराये विद्महे,

शत्रुनिशुथिन्ये धीमहि।

तन्नो देवी प्रचोदयात्।।

संदर्भ:

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

Saptamatrka – Part Four

http://www.blog.vedicfolks.com/ashta-matrika-gayatri-mantra/

www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

www. templepurohit.com

https://en.wikipedia.org/wiki/Pratyangira

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