Koumari

कौमारी

कुमारा रूपा कौमारी, मयूरा बर वाहना।
रक्त वस्त्राधरा पद्म-शुला-शक्ति-गन्धरा एति कौमारी।।

(रूपमंडन)

कौमारी सात मातृकाओं में से तीसरी है। कौमारी को कुमारी, कार्तिकेयनी, अंबिका, देवसेना, महाविद्या, मयूरवाहिनी, स्वाहा, इला और शक्ति के नाम से भी जाना जाता है। यह भगवान स्कंद, मुरुगन, कुमारा जो युद्ध के देवता और देवताओं के प्रमुख सेनापति हैं की शक्ति है।

पुर्वकर्णगमा और देवी पुराण के अनुसार उनका रंग सुनहरा पीला है और वह लाल वस्त्र धारण किये हुये है। लाल फूलों की माला और करंड-मुकुट (बेलनाकार मुकुट) से सुशोभित है। वह एक अंजीर के पेड़ के नीचे बैठी है, मोर उनका वाहन और पताका चिंह भी हैं।

चतृभुजी:
  • पुर्वकर्णगमा और देवी पुराण के अनुसार उनके दो हाथों में शक्ति और अंकुश है और अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं।
  • कुछ स्थानों पर उनको अपने तीन हाथों में वज्र, भाला, दण्डम या त्रिशूल लिए हुए और एक हाथ अभय मुद्रा में दिखाया गया है। वह अपने ‘राजसी रूप ’में मोर पर बैठी है।
द्वादशभुजी:

विष्णु धर्मोत्तरा के अनुसार, कौमारी के छह चेहरे हैं और उनके प्रत्येक सिर पर सीधी तीन आंखें और बारह भुजाएं हैं; उसके दो हाथ अभय और वरद मुद्राओं में हैं। जबकि अपने अन्य हाथों में वह शक्ति, ध्वजा, दंड, धनुष, बाण, घण्टा, पद्म,पत्र, कुल्हाड़ी और परशु धारण करती है।

कौमारी का इतिहास:

अन्य मातृकाओं की तरह वह महारुद्र द्वारा अंधका राक्षस के रक्त पीने के उद्देश्य से प्रगट की गई थी। मातृकाएँ देवताओं की शक्ति हैं। तैत्तिरीय आरण्यक उन्हें स्कंद या कार्तिकेय की शक्ति के रूप में संदर्भित करता है और इन्हें कौमारी या कार्तिकेयनी के रूप में जाना जाता है। वह अपने जीवनसाथी स्कंद कुमार की तरह हमेशा युवा और वीरता के गुणों से निहित है। वे आत्मा के क्रमिक विकास संबंधी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करती है।

कौमारी को गुरु-गुहा भी कहा जाता है। ‘गुरु’ का अर्थ है मार्गदर्शक, शिक्षक और ‘गुहा’ का अर्थ है हृदय की गुफा, बुद्धि।

‘कौमारी’ कन्याकुमारी ’का छोटा रूप है, तमिलनाडु में एक स्थान कन्याकुमारी हैं और वहाँ की लोकप्रिय देवी का नाम भी यही है। उन्हें ‘कौमारी अम्मन’ के नाम से जाना जाता है और दक्षिण में उनकी पूजा की जाती है।

तंत्र शास्त्र :

तंत्र शास्त्र के अनुसार, वह ‘अग्नि मंडल शक्ति’ है और आग्नेय दिशा की अधिपति है। वह हमारी नेतृत्व की गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।

उन्हें साँप के रूप में दर्शित किया जाता है और मनसा या नाग माता कहा जाता है। किसी भी नाग देवी का मंदिर उनके ही हैं और ‘काल सर्प दोष’ के लिए लोग उनकी पूजा करते हैं।

वे प्रजनन की उर्वरा देवी हैं और बांझपन से संबंधित विकारों के लिए उनकी पूजा की जाती है। मंगलवार को सुबह 6 से 9 के बीच दूध से अभिषेक कर के लाल फूल और दूध नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता हैं। चावल के आटे से बना दीपक जला करके उनकी पूजा की जाती है।

दक्षिण में उनके भक्तजन जीभ में नुकीली छड़ या भाला और नुकीली छड़ वाली कावडियों को अपनी पीठ में छेदते हैं। भक्तों का मानना ​​है कि जब माता उन्हें दर्द में देखती है, तो वह उनकी इच्छाओं को जल्दी पूरा करती है।

नेपाल में देवी कौमारी परंपरा:

कौमारी को नेपाल में भद्रकाली के रूप में पूजा जाता है और वह अष्ट मातृकाओं में से पांचवीं देवी है। स्थानीय लोग उन्हें‘लुमाधी अजिमा’ के नाम से बुलाते है।

नेपाल में काठमांडू, ललितपुर,भक्तपुर,संखु और बुङमती में कौमारी देवी को समर्पित कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। नेपाल में ‘जीवित देवी’ के रूप में दिव्य महिला ऊर्जा की अभिव्यक्ती के रूप में किशोरीयों की पूजा करने की परंपरा है। जब वह रजस्वला हो जाती है, तो यह माना जाता है कि देवी उसके शरीर को छोड़ कर दूसरी किशोरी का चयन करती है।

तिब्बती वज्रयान या तांत्रिक बौद्ध धर्म:

6 वीं शताब्दी के सबसे बड़े क्रिया तंत्रों में से एक हैं ‘मंजुश्री मूलकल्प’। यह बौद्ध धर्म के कर्मकांड के तत्वों की शिक्षा के लिए पूर्णतया समर्पित है और इसे बुद्ध शाक्य मुनि द्वारा पढ़ाया गया था। तिब्बती बौद्ध-साहित्य मोटे तौर पर इन निम्न श्रेणियों में विभाजित है :

  • कंग्युर: इसमें बुद्ध द्वारा दी गई शिक्षा शामिल हैं।
  • तेंगयूर ‘ तथा ‘ तेंग़्यूर: इसमें विभिन्न स्रोतों से की गई टिप्पणियां या भाष्य सम्मिलित हैं।
  • गोपनीय और तंत्र तकनीक (वज्रयान) इसको स्वतंत्र रूप से एकत्र किया गया है।

10 वीं शताब्दी के ‘डाकार्णव’ के अनुसार, हेरुक मंड़ला को तीन विभागों में विभाजित किया गया हैं उनमें से एक मदीना चक्र है, जिसमें चार द्वार हैं और 4 डाकिनीयों (माताओं) द्वारा संरक्षित हैं। कौमारी उनमें से एक है और वह पश्चिमी द्वार की रखवाली करती है।

डाकार्णव: बौद्ध चक्रसमवरा से संबंधित तंत्र।
हेरुक: संस्कृत शब्द हेरुक शब्द का अर्थ, चीनी और तिब्बती दोनों में “रक्त पीने वाला” होता हैं।

पाठांतर-1

ॐ सिकी ध्वजाये विदमहे, व्रज हस्ताय धीमहि।

तन्नौः कौमारी प्रचोदयात।।

पाठांतर-2

ॐ दिव्य रूपिणी विदमहे, व्रज हस्ताये धीमहि।

तन्नौः कौमारी प्रचोदयात।।

मोर की प्रतीकात्मकता:

  • मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे शुभ पक्षी है। मोर अचेतन, धैर्य, परोपकार और करुणा का प्रतीक है। साथ ही वह दृष्टि, आत्म-अभिव्यक्ति, आध्यात्मिकता, जागृति, अखंडता, स्वतंत्रता, मार्गदर्शन, संरक्षण, निगरानी, ​​अखंडता और कायाकल्प का प्रतीक है।
  • मोर पीड़ा और दैनिक संघर्षों के दौर से गुजरने का प्रतीक है। यह माना जाता है कि सच्चे व्यक्तित्वके निखार के लिये दुख और दर्द आवश्यक हैं। मोर हमें जिद्दी, अक्खड़, अहंकारी और गैरमिलनसार बनने से रोक कर, हम में आत्म-प्रेम, आत्मविश्वास और विनम्रता का एक नाजुक संतुलन बनाए रखने महत्वपूर्ण संदेश देता है।
  • मोर के पंखों का नीला हरा रंग अक्सर राजसी, आत्मविश्वास और नेतृत्व के साथ जोड़ा गया है। पंखों पर “आंखों” का विशिष्ट छाप दृष्टि और ज्ञान के साथ जुड़ा हुआ है।
  • सपने में मोर को देखना आमतौर पर एक अच्छा शगुन है। वे दीर्घायु और कायाकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बताते हैं कि यह समय एक कदम वापस ले कर यह जांचने का है कि हम जीवन में कहां हैं और हम कहां जाना चाहते हैं। इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता हैं कि कोई आप पर नज़र लगाये हुये हैं आप सतर्क हो जायें।
  • भारत में लोग अपने घरों के अंदर मोर के पंख रखते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि उनके पंखों से उनका भाग्योदय और समृद्धि होगी। पंखों से कीड़े और मक्खियाँ भी दूर होती हैं।
  • कई पारंपरिक उपचारिक परंपराओं में जहर और नकारात्मकता को बाहर निकालने के लिए पंखों को घावों पर रख कर उन्हें बांध दिया गया है।

भगवान कृष्ण और मोरपंख:

भगवान कृष्ण और मोर पंख अविभाज्य हैं। उन्हें भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है। कृष्ण एक चरवाहे राजा द्वारा पालित थे और वे गोपीयों के घर जा कर मक्खन चुराते थे। उनकी इसी मानवीय पृष्ठभूमि के कारण उन्हे एक सर्वोच्च भगवान का दर्जा दिया जाता हैं। किंवदंती है कि एक दोपहर को कृष्ण ने गाय चराने के समय झपकी ले रहे अपने सहकर्मी मित्रों को बांसुरी बजाकर जगा दिया। गोप सखा झुमने लगे, उसी समय बांसुरी की मधुर ध्वनी सुन कर पहाड़ियों और जंगलों से असंख्य मोरों के झुंड आ गये और कृष्ण और उनके दोस्तों को घेर कर झूमने और नाचने लगे। जब कृष्ण ने बांसुरी बजानी बंद कर दी तो भी सारे मोर मंत्रमुग्ध हो कर झूमते रहे। मोरों के राजा ने कृष्ण को प्रणाम किया और अपने साथियों को इस तरह का स्वर्गीय आंनद देने और एक स्मरणीय दिन बनाने के लिए धन्यवाद दिया। मोर हमेशा के लिए कृष्ण के ऋणी हो गए और उन्होंने कृष्ण से अपने सुंदर आकर्षक पंख को पहनने का अनुरोध किया। कृष्ण ने उन्हे सम्मान देने के लिए मोर पंख अपने सिर पर धारण कर लिया। यही कारण है कि मोर पंख भगवान कृष्ण के मुकुट पर देखा जाता है।

अंजीर या गूलर के पेड़ की प्रतीकात्मकता

‘उदुम्बर’ अंजीर के पेड़ का संस्कृत नाम है। अन्य संस्कृत के नाम हैं, अपुष्पा फला सम्बन्ध, हरितक्ष, और हेमदुग्धा। यह भारत का मूल निवासी है और इसका वैज्ञानिक नाम ‘फिकस रेसमोस’ है। हमारे ऋर्षि मनीषीयों ने अपनी दूरदर्शिता से अंजीर के पेड़ को धार्मिकता से जोड़ दिया कि देवी चामुंडा अंजीर के पेड़ के नीचे बैठी है, जिस से आम आदमी पेड़ को संरक्षित करेगा, जो मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी है। इस पेड़ को संरक्षित क्यों किया जाना चाहिए, यह इसके निम्न औषधीय गुणों के आधार पर निर्णित किया जा सकता है।

पौराणिक संदर्भ
  • वेदों के अनुसार, भगवान विष्णु वृक्ष के अवतार हैं और उदुम्बरा के नाम से जाने जाते हैं। यह पेड़ सौभाग्य का प्रतीक है, समृद्धि लाता है और दुश्मनों को नष्ट करता है।
  • इसकी पवित्र लकड़ी का उपयोग हवन या यज्ञ में किया जाता है। राजा हरीशचंद्र का सिंहासन उदुम्बरा से बना था और राजा भगवान के नाम का जाप करते हुए अपने घुटनों पर चढ़ कर सिंहासन पर बैठते थे। ऐसी मान्यता थी की ऐसे करने से राजा अपने साथ भगवान को भी साथ सिंहासन पर आसीन करते थे।
  • प्राचीन समय में, उप हिमालयी क्षेत्र में एक योद्धा कबीला था, जिसे ‘उदुम्बरा’ के नाम से जाना जाता था, वहाँ से उदुम्बरा वृक्ष के रूपांकनों वाले सिक्के भी मिले थे।
  • बौद्ध ग्रंथों में उदुम्बरा को नील कमल के रूप में जाना जाता है और इसे पवित्र माना जाता है, क्योंकि पूर्व बुद्ध- कनकमुनि (पाली में कनक मना) ने इस वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान प्राप्त किया था।
  • गुरु दत्तात्रेय, जिसे त्रिदेव के रूप में जाना जाता है, इस पेड़ में निवास करते हैं, इसलिये उनका मंदिर अंजीर के पेड़ों से घिरा हुआ होता है। गुरु चरित्र के अनुसार यह वृक्ष कलियुग का ‘कल्पतरु’ है।
औषधीय गुण

उदुम्बरा एक प्राचीन औषधीय पौधा है जो पूरा दिन ऑक्सीजन उत्पन्न करता रहता है। पौधे के सभी भागों से जैसे पत्ते, फल, छाल, जड़. गोंद (लेटेक्स) और रस, विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि इसमें त्वचा संबंधी बीमारियों को ठीक करने की शक्ति है और ऋग्वेद कहता है कि यह बवासीर, कीड़े के कारण आंतों के अल्सर के उपचार में प्रभावी है और रक्त शोधक के रूप में काम करता है।

महर्षि चरक ने विभिन्न रोगों के लिए इस वृक्ष से निर्मित जड़ी-बूटियों का वर्गीकरण किया है, जैसे: सूजन-नाशक,ज्वरनाशक, मूत्र विसर्जन को नियंत्रित करने वाला,जीवाणु-नाशक,

लिवर का सुरक्षा कवच, एंटीऑक्सिडेंट, कीमो (कोशिकायें जो कैंसर में बढ़ती हैं) निवारक, फाइलेरिया-नाशक आदि। इस की जड़ी-बूटियों से फ्रैक्चर जल्दी ठीक हो जाते हैं। इससे रक्त, पित्त, जलन, मोटापा और योनि से संबंधित विकारों में राहत मिलती है।

 

संदर्भ:

http://murugan.org/research/kaumari-iconography.htm

https://en.wikipedia.org/wiki/Kaumari

https://www.wisdomlib.org/definition/kaumari

https://www.wisdomlib.org/Saktism

https://www.wisdomlib.org/Tibetan Buddhism

https://www.facebook.com/groups/feed/

https://sreenivasaraos.com/tag/saptamatrika

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

https://www.hinduscriptures.in/vedic-lifestyle/food/trees/udumbara

blog.buddhagroove.com/the-spiritual-significance-of-peacocks

academia.edu: The Structure and Meanings of the Heruka Maṇḍala

Kamakoti Mandali: The Yoginis of Narasimha Vyuha

Kamakoti Mandali: The Yoginis of Nrisimha matrika-mandala

Photo: google images

www.DrikPanchang.com

 

 

 

 

 

कौमारी

कुमारा रूपा कौमारी, मयूरा बर वाहना।
रक्त वस्त्राधरा पद्म-शुला-शक्ति-गन्धरा एति कौमारी।।

(रूपमंडन)

कौमारी सात मातृकाओं में से तीसरी है। कौमारी को कुमारी, कार्तिकेयनी, अंबिका, देवसेना, महाविद्या, मयूरवाहिनी, स्वाहा, इला और शक्ति के नाम से भी जाना जाता है। यह भगवान स्कंद, मुरुगन, कुमारा जो युद्ध के देवता और देवताओं के प्रमुख सेनापति हैं की शक्ति है।

पुर्वकर्णगमा और देवी पुराण के अनुसार उनका रंग सुनहरा पीला है और वह लाल वस्त्र धारण किये हुये है। लाल फूलों की माला और करंड-मुकुट (बेलनाकार मुकुट) से सुशोभित है। वह एक अंजीर के पेड़ के नीचे बैठी है, मोर उनका वाहन और पताका चिंह भी हैं।

चतृभुजी:
  • पुर्वकर्णगमा और देवी पुराण के अनुसार उनके दो हाथों में शक्ति और अंकुश है और अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं।
  • कुछ स्थानों पर उनको अपने तीन हाथों में वज्र, भाला, दण्डम या त्रिशूल लिए हुए और एक हाथ अभय मुद्रा में दिखाया गया है। वह अपने ‘राजसी रूप ’में मोर पर बैठी है।
द्वादशभुजी:

विष्णु धर्मोत्तरा के अनुसार, कौमारी के छह चेहरे हैं और उनके प्रत्येक सिर पर सीधी तीन आंखें और बारह भुजाएं हैं; उसके दो हाथ अभय और वरद मुद्राओं में हैं। जबकि अपने अन्य हाथों में वह शक्ति, ध्वजा, दंड, धनुष, बाण, घण्टा, पद्म,पत्र, कुल्हाड़ी और परशु धारण करती है।

कौमारी का इतिहास:

अन्य मातृकाओं की तरह वह महारुद्र द्वारा अंधका राक्षस के रक्त पीने के उद्देश्य से प्रगट की गई थी। मातृकाएँ देवताओं की शक्ति हैं। तैत्तिरीय आरण्यक उन्हें स्कंद या कार्तिकेय की शक्ति के रूप में संदर्भित करता है और इन्हें कौमारी या कार्तिकेयनी के रूप में जाना जाता है। वह अपने जीवनसाथी स्कंद कुमार की तरह हमेशा युवा और वीरता के गुणों से निहित है। वे आत्मा के क्रमिक विकास संबंधी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करती है।

कौमारी को गुरु-गुहा भी कहा जाता है। ‘गुरु’ का अर्थ है मार्गदर्शक, शिक्षक और ‘गुहा’ का अर्थ है हृदय की गुफा, बुद्धि।

‘कौमारी’ कन्याकुमारी ’का छोटा रूप है, तमिलनाडु में एक स्थान कन्याकुमारी हैं और वहाँ की लोकप्रिय देवी का नाम भी यही है। उन्हें ‘कौमारी अम्मन’ के नाम से जाना जाता है और दक्षिण में उनकी पूजा की जाती है।

तंत्र शास्त्र :

तंत्र शास्त्र के अनुसार, वह ‘अग्नि मंडल शक्ति’ है और आग्नेय दिशा की अधिपति है। वह हमारी नेतृत्व की गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।

उन्हें साँप के रूप में दर्शित किया जाता है और मनसा या नाग माता कहा जाता है। किसी भी नाग देवी का मंदिर उनके ही हैं और ‘काल सर्प दोष’ के लिए लोग उनकी पूजा करते हैं।

वे प्रजनन की उर्वरा देवी हैं और बांझपन से संबंधित विकारों के लिए उनकी पूजा की जाती है। मंगलवार को सुबह 6 से 9 के बीच दूध से अभिषेक कर के लाल फूल और दूध नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता हैं। चावल के आटे से बना दीपक जला करके उनकी पूजा की जाती है।

दक्षिण में उनके भक्तजन जीभ में नुकीली छड़ या भाला और नुकीली छड़ वाली कावडियों को अपनी पीठ में छेदते हैं। भक्तों का मानना ​​है कि जब माता उन्हें दर्द में देखती है, तो वह उनकी इच्छाओं को जल्दी पूरा करती है।

नेपाल में देवी कौमारी परंपरा:

कौमारी को नेपाल में भद्रकाली के रूप में पूजा जाता है और वह अष्ट मातृकाओं में से पांचवीं देवी है। स्थानीय लोग उन्हें‘लुमाधी अजिमा’ के नाम से बुलाते है।

नेपाल में काठमांडू, ललितपुर,भक्तपुर,संखु और बुङमती में कौमारी देवी को समर्पित कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। नेपाल में ‘जीवित देवी’ के रूप में दिव्य महिला ऊर्जा की अभिव्यक्ती के रूप में किशोरीयों की पूजा करने की परंपरा है। जब वह रजस्वला हो जाती है, तो यह माना जाता है कि देवी उसके शरीर को छोड़ कर दूसरी किशोरी का चयन करती है।

तिब्बती वज्रयान या तांत्रिक बौद्ध धर्म:

6 वीं शताब्दी के सबसे बड़े क्रिया तंत्रों में से एक हैं ‘मंजुश्री मूलकल्प’। यह बौद्ध धर्म के कर्मकांड के तत्वों की शिक्षा के लिए पूर्णतया समर्पित है और इसे बुद्ध शाक्य मुनि द्वारा पढ़ाया गया था। तिब्बती बौद्ध-साहित्य मोटे तौर पर इन निम्न श्रेणियों में विभाजित है :

  • कंग्युर: इसमें बुद्ध द्वारा दी गई शिक्षा शामिल हैं।
  • तेंगयूर ‘ तथा ‘ तेंग़्यूर: इसमें विभिन्न स्रोतों से की गई टिप्पणियां या भाष्य सम्मिलित हैं।
  • गोपनीय और तंत्र तकनीक (वज्रयान) इसको स्वतंत्र रूप से एकत्र किया गया है।

10 वीं शताब्दी के ‘डाकार्णव’ के अनुसार, हेरुक मंड़ला को तीन विभागों में विभाजित किया गया हैं उनमें से एक मदीना चक्र है, जिसमें चार द्वार हैं और 4 डाकिनीयों (माताओं) द्वारा संरक्षित हैं। कौमारी उनमें से एक है और वह पश्चिमी द्वार की रखवाली करती है।

डाकार्णव: बौद्ध चक्रसमवरा से संबंधित तंत्र।
हेरुक: संस्कृत शब्द हेरुक शब्द का अर्थ, चीनी और तिब्बती दोनों में “रक्त पीने वाला” होता हैं।

पाठांतर-1

ॐ सिकी ध्वजाये विदमहे, व्रज हस्ताय धीमहि।

तन्नौः कौमारी प्रचोदयात।।

पाठांतर-2

ॐ दिव्य रूपिणी विदमहे, व्रज हस्ताये धीमहि।

तन्नौः कौमारी प्रचोदयात।।

मोर की प्रतीकात्मकता:

  • मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे शुभ पक्षी है। मोर अचेतन, धैर्य, परोपकार और करुणा का प्रतीक है। साथ ही वह दृष्टि, आत्म-अभिव्यक्ति, आध्यात्मिकता, जागृति, अखंडता, स्वतंत्रता, मार्गदर्शन, संरक्षण, निगरानी, ​​अखंडता और कायाकल्प का प्रतीक है।
  • मोर पीड़ा और दैनिक संघर्षों के दौर से गुजरने का प्रतीक है। यह माना जाता है कि सच्चे व्यक्तित्वके निखार के लिये दुख और दर्द आवश्यक हैं। मोर हमें जिद्दी, अक्खड़, अहंकारी और गैरमिलनसार बनने से रोक कर, हम में आत्म-प्रेम, आत्मविश्वास और विनम्रता का एक नाजुक संतुलन बनाए रखने महत्वपूर्ण संदेश देता है।
  • मोर के पंखों का नीला हरा रंग अक्सर राजसी, आत्मविश्वास और नेतृत्व के साथ जोड़ा गया है। पंखों पर “आंखों” का विशिष्ट छाप दृष्टि और ज्ञान के साथ जुड़ा हुआ है।
  • सपने में मोर को देखना आमतौर पर एक अच्छा शगुन है। वे दीर्घायु और कायाकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बताते हैं कि यह समय एक कदम वापस ले कर यह जांचने का है कि हम जीवन में कहां हैं और हम कहां जाना चाहते हैं। इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता हैं कि कोई आप पर नज़र लगाये हुये हैं आप सतर्क हो जायें।
  • भारत में लोग अपने घरों के अंदर मोर के पंख रखते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि उनके पंखों से उनका भाग्योदय और समृद्धि होगी। पंखों से कीड़े और मक्खियाँ भी दूर होती हैं।
  • कई पारंपरिक उपचारिक परंपराओं में जहर और नकारात्मकता को बाहर निकालने के लिए पंखों को घावों पर रख कर उन्हें बांध दिया गया है।

भगवान कृष्ण और मोरपंख:

भगवान कृष्ण और मोर पंख अविभाज्य हैं। उन्हें भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है। कृष्ण एक चरवाहे राजा द्वारा पालित थे और वे गोपीयों के घर जा कर मक्खन चुराते थे। उनकी इसी मानवीय पृष्ठभूमि के कारण उन्हे एक सर्वोच्च भगवान का दर्जा दिया जाता हैं। किंवदंती है कि एक दोपहर को कृष्ण ने गाय चराने के समय झपकी ले रहे अपने सहकर्मी मित्रों को बांसुरी बजाकर जगा दिया। गोप सखा झुमने लगे, उसी समय बांसुरी की मधुर ध्वनी सुन कर पहाड़ियों और जंगलों से असंख्य मोरों के झुंड आ गये और कृष्ण और उनके दोस्तों को घेर कर झूमने और नाचने लगे। जब कृष्ण ने बांसुरी बजानी बंद कर दी तो भी सारे मोर मंत्रमुग्ध हो कर झूमते रहे। मोरों के राजा ने कृष्ण को प्रणाम किया और अपने साथियों को इस तरह का स्वर्गीय आंनद देने और एक स्मरणीय दिन बनाने के लिए धन्यवाद दिया। मोर हमेशा के लिए कृष्ण के ऋणी हो गए और उन्होंने कृष्ण से अपने सुंदर आकर्षक पंख को पहनने का अनुरोध किया। कृष्ण ने उन्हे सम्मान देने के लिए मोर पंख अपने सिर पर धारण कर लिया। यही कारण है कि मोर पंख भगवान कृष्ण के मुकुट पर देखा जाता है।

अंजीर या गूलर के पेड़ की प्रतीकात्मकता

‘उदुम्बर’ अंजीर के पेड़ का संस्कृत नाम है। अन्य संस्कृत के नाम हैं, अपुष्पा फला सम्बन्ध, हरितक्ष, और हेमदुग्धा। यह भारत का मूल निवासी है और इसका वैज्ञानिक नाम ‘फिकस रेसमोस’ है। हमारे ऋर्षि मनीषीयों ने अपनी दूरदर्शिता से अंजीर के पेड़ को धार्मिकता से जोड़ दिया कि देवी चामुंडा अंजीर के पेड़ के नीचे बैठी है, जिस से आम आदमी पेड़ को संरक्षित करेगा, जो मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी है। इस पेड़ को संरक्षित क्यों किया जाना चाहिए, यह इसके निम्न औषधीय गुणों के आधार पर निर्णित किया जा सकता है।

पौराणिक संदर्भ
  • वेदों के अनुसार, भगवान विष्णु वृक्ष के अवतार हैं और उदुम्बरा के नाम से जाने जाते हैं। यह पेड़ सौभाग्य का प्रतीक है, समृद्धि लाता है और दुश्मनों को नष्ट करता है।
  • इसकी पवित्र लकड़ी का उपयोग हवन या यज्ञ में किया जाता है। राजा हरीशचंद्र का सिंहासन उदुम्बरा से बना था और राजा भगवान के नाम का जाप करते हुए अपने घुटनों पर चढ़ कर सिंहासन पर बैठते थे। ऐसी मान्यता थी की ऐसे करने से राजा अपने साथ भगवान को भी साथ सिंहासन पर आसीन करते थे।
  • प्राचीन समय में, उप हिमालयी क्षेत्र में एक योद्धा कबीला था, जिसे ‘उदुम्बरा’ के नाम से जाना जाता था, वहाँ से उदुम्बरा वृक्ष के रूपांकनों वाले सिक्के भी मिले थे।
  • बौद्ध ग्रंथों में उदुम्बरा को नील कमल के रूप में जाना जाता है और इसे पवित्र माना जाता है, क्योंकि पूर्व बुद्ध- कनकमुनि (पाली में कनक मना) ने इस वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान प्राप्त किया था।
  • गुरु दत्तात्रेय, जिसे त्रिदेव के रूप में जाना जाता है, इस पेड़ में निवास करते हैं, इसलिये उनका मंदिर अंजीर के पेड़ों से घिरा हुआ होता है। गुरु चरित्र के अनुसार यह वृक्ष कलियुग का ‘कल्पतरु’ है।
औषधीय गुण

उदुम्बरा एक प्राचीन औषधीय पौधा है जो पूरा दिन ऑक्सीजन उत्पन्न करता रहता है। पौधे के सभी भागों से जैसे पत्ते, फल, छाल, जड़. गोंद (लेटेक्स) और रस, विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि इसमें त्वचा संबंधी बीमारियों को ठीक करने की शक्ति है और ऋग्वेद कहता है कि यह बवासीर, कीड़े के कारण आंतों के अल्सर के उपचार में प्रभावी है और रक्त शोधक के रूप में काम करता है।

महर्षि चरक ने विभिन्न रोगों के लिए इस वृक्ष से निर्मित जड़ी-बूटियों का वर्गीकरण किया है, जैसे: सूजन-नाशक,ज्वरनाशक, मूत्र विसर्जन को नियंत्रित करने वाला,जीवाणु-नाशक,

लिवर का सुरक्षा कवच, एंटीऑक्सिडेंट, कीमो (कोशिकायें जो कैंसर में बढ़ती हैं) निवारक, फाइलेरिया-नाशक आदि। इस की जड़ी-बूटियों से फ्रैक्चर जल्दी ठीक हो जाते हैं। इससे रक्त, पित्त, जलन, मोटापा और योनि से संबंधित विकारों में राहत मिलती है।

 

संदर्भ:

http://murugan.org/research/kaumari-iconography.htm

https://en.wikipedia.org/wiki/Kaumari

https://www.wisdomlib.org/definition/kaumari

https://www.wisdomlib.org/Saktism

https://www.wisdomlib.org/Tibetan Buddhism

https://www.facebook.com/groups/feed/

https://sreenivasaraos.com/tag/saptamatrika

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

https://www.hinduscriptures.in/vedic-lifestyle/food/trees/udumbara

blog.buddhagroove.com/the-spiritual-significance-of-peacocks

academia.edu: The Structure and Meanings of the Heruka Maṇḍala

Kamakoti Mandali: The Yoginis of Narasimha Vyuha

Kamakoti Mandali: The Yoginis of Nrisimha matrika-mandala

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