सप्त मातृका

सप्त मातृका

सप्त मातृका

‘मातृका’ का मूल शब्द ‘मातृ’ है जिसका अर्थ है ‘माँ’। यह माना जाता है कि उनमें वह शक्ति है जो मातृ गुणों का प्रतीक है और इस ब्रह्मांड की सभी शक्तियों की रक्षक, प्रदाता और पालनकर्ता भी है। जैसे पृथ्वी की हर चीज सूर्य से अपनी स्रोत ऊर्जा प्राप्त करती है, वैसे ही ब्रह्माण्ड की सभी ऊर्जाएं अपनी शक्ति मातृकाओं से प्राप्त करती हैं। मातृकाओं की तंत्र-विद्या में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि उनमें जन्मजात क्षमता है, जिस के फलस्वरूप वह स्वयं का प्रतिरूप बना सकती है और उनके प्रतिरूप भी अन्य शक्तियों और रूपों को जन्म दे सकते हैं। वह अपने सूक्ष्म रूप में हर जगह और हर चीज में है लेकिन यह मान्यता है कि वे अपने प्रकट रूप में ब्रह्मांड में उपस्थित है और आठ दिशाओं पर शासन करती है जो अनंत का भी प्रतीक है।

उत्पत्ति के पूर्व:

मातृका हमेशा अपने मूल रूप योगमाया के रूप में मौजूद रहती हैं और वे इस ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति है। शिव परम देव हैं और उनके भीतर योगमाया निवास करती हैं। योगमाया के कारण, शिव को ईश्वर माना जाता है, योगमाया की शक्ति के अभाव में शिव एक शव तुल्य हो जाते है।
वह सृष्टि के पहले भी शिव के भीतर विद्यमान थी। हर विध्वंस का एक सही समय होता है, जैसे प्रकृति एक फूल को अपने चरम तक खिलने देती है और फिर उसे मुरझा कर नष्ट कर देती है, जिससे नए फूलों को खिलने का अवसर मिलता है, वैसे ही शिव का प्रमुख कर्तव्य है कि पहले की सभी कृतियों के अस्तित्व को जड़ से मिटा देवें ताकि नव-निर्माण हो सके।

ऐसा करने के लिए भगवान शिव को शक्ति और ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो ब्रह्मांड को एक फूल की तरह खिलने के लिए पोषित कर सके, ठीक उसी तरह जिस तरह एक मां की अपनी नई रचना के पोषण के लिए आवश्यक होता है। इस ऊर्जा को “मातृ पुंजा” कहा जाता है, जो स्वयं को द्विगुणित या जनन करके इस ब्रह्मांड के हर हिस्से में अपने आप को विलय कर देती हैं । इस प्रकार मातृका सृष्टि में हर जगह मौजूद हो जाती हैं। उनकी वजह से है ब्रह्मांड आत्म-पालन और आत्म-पोषण कर सकता है, यह तब तक चलता रहता हैं जब तक कि महाप्रलय नहीं हो जाता। एक रचना के विनाश के बाद, दूसरी एक नई रचना होती है और यही मातृकायें फिर से नए ब्रह्मांड के निर्वाहक और पोषणकर्ता की भूमिका निभाती है। यह क्रम अनवरत चलता रहता है।

उत्पत्ति की कहानी:

“सिद्ध धर्म” के अनुसार, पहली रचना के बाद, ब्रह्मांड का निर्माण और विनाश का चक्र आरंभ हो गया। शिव और योगमाया हिमालय के कैलाश पर्वत से संतों और ऋषियों को आगम-निगम की ज्ञानमयी बुद्धि प्रदान करने के लिए उतरे। वे अक्सर तंत्र-मंत्र के बारे में एक-दूसरे के साथ बातचीत में संलग्न होते थे और उन वार्ता को संतों के साथ-साथ सिद्धियों और महर्षि विश्वामित्र ने भी सुना था। उन्होंने फिर इन वार्ताओं की सांकेतिक भाषा का सरलीकरण कर के इस ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया।

मार्कण्डेय पुराण:
मार्कण्डेय पुराण में वर्णन मिलता है कि युद्ध में चण्डिका की सहायता के लिए सप्तमातृकाएं उत्पन्न हुईं थीं। ये सप्तमातृकाएं चण्डिका में समावित हो गई। इन्हीं सप्तमातृकाओं की सहायता से देवी ने रक्तबीज का वध किया था। ये सात देवियां अपने पतियों के वाहन तथा आयुध के साथ यहां उपस्थित होती हैं; यस्य देवस्य यत्रूपं यथाभूषण वाहनम्।

देवी महात्म्यम:
देवी महात्म्यम के संस्करण के अनुसार, दुर्गा ने स्वयं मातृकाओं की रचना की। जब दैत्य शुम्भ दुर्गा को युद्ध में चुनौती देता है, तब दुर्गा ने इनकी मदद से राक्षस सेना का वध किया। उसके बाद राक्षस रक्तबिज के रक्त को चूस कर उसका वध भी किया। वहीं यह भी जिक्र आता है कि देवी दुर्गा कहती हैं कि यह सभी मेरे ही रूप हैं और अंतत: ये सब मुझमें ही समाहित हो जातीं हैं। यहाँ काली को एक मातृका के रूप में वर्णित किया गया हैं। चंड-मुंड का संहार करने के लिये काली को चामुंडा भी कहा गया है।

मत्स्य पुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण:
मत्स्य और विष्णुधर्मोत्तार पुराण में मातृकाओं के जन्म की कथा विस्तृत रुप में दी गयी है। हिरण्याक्ष राक्षस का पुत्र अंधक शिव का परमभक्त था । शिव ने उसे वर प्रदान किया था ‘रणभूमि में तुम्हारे लहू के हर एक बूँद से नया अंधकासुर उत्पन्न होगा, जिसे कारण तुम युद्ध में अजेय होंगे । शिव के इस आशीर्वाद के कारण, सारी पृथ्वी अंधकासुरों से त्रस्त हुयी । फिर इन अंधकासुरों का लहू चुसने के लिए शिव ने ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि सात मातृकाओं का निर्माण किया । इन्होने अंधकासुर का सारा लहू चूस लिया, एवं तत्पश्चात् शिव ने अंधकासुर का वध किया । अंधकासुर का वध होने के पश्चात्, शिव के द्वारा उत्पन्न सात मातृका पृथ्वी पर के समस्त प्राणिजात का लहू चूसने लगी । फिर उनका नियंत्रण करने के लिए, शिव ने नृसिंह का निर्माण किया, जिसने अपने जिह्रादि अवयवों से घंटाकर्णो, त्रैलोक्यमोहिनी, आदि बतीस मातृकाओं का निर्माण किया । इन बतीस मातृकाओं ने सात मातृकाओं को शांत किया। नरसिंह ने मातृकाओं को दुनिया को नष्ट करने बजाय उस की रक्षा करने की आज्ञा दी, जिस से वे माता के रूप में पूजित हो जायें। इस तरह मातृकायें एक तरफ देवताओं की युद्ध में मदद करने वाली शक्तियाँ हैं, जो शत्रु-संहारक की भूमिका निभाती हैं, दूसरी ओर पालनकर्ता वाला रूप भी हैं।

सप्त-मातृकाओं की रूपकात्मकता:

शिव ज्ञान की आत्मा हैं। अंधक अज्ञानता या अंधकार का प्रतिनिधित्व करता है। जितना अधिक ज्ञान अज्ञान पर हमला करता है, उतना ही अधिक यह उठता हैं और बढ़ता है। यह अन्धकासुर का बहुलीकरण हैं और दूसरे क्रम के उप-असुरों के जन्म द्वारा दर्शाया गया है। जब तक आठ बुरे गुण: काम, क्रोध, लोभ, मद या घमंड, मोह या भ्रम, ईर्ष्या, निंदा और द्वेष को ज्ञान के नियंत्रण और संयम में नहीं रखा जाता तब तक यह अंधकारा को समाप्त करने में कभी भी सफलता नहीं मिल सकती।

वराह पुराण में कहा गया है कि मातृकायें आत्म ज्ञान हैं, जो अज्ञानता रूपी अंधकासुर के विरूद्ध युद्ध करती हैं। पुराणों में यह भी कहा गया है कि मातृकायें शरीर के मूल जीवंत अस्तित्व पर शासन करती हैं।

• ब्राह्मणी: त्वचा,
• माहेश्वरी: रक्त,
• कौमारी: मांसपेशियां
• वैष्णवी: हड्डी,
• ऐंद्री: अस्थि मज्जा,
• चामुंडा: वीर्य।

इन मातृकाओं को शरीर के उपरोक्त मूल जीवंत अवयवों की अधिदात्री माना जाता हैं।

मातृकाओं की प्राचीनता:

वैदिक ग्रंथों में एवं गृह्यसूत्रों में मातृकाओं का उल्लेख अप्राप्य है। सर्व प्रथम इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता हैं। इससे प्रतीत होता है कि मातृकाओं की उपासना वैदिकेतर संस्कृति से शुरू हुई होगी। कुछ विद्वानों का मानना है कि मातृकाएं अनार्य परंपरा की ग्राम्य देवियां हैं जिसे कालांतर में आर्य परंपरा में भी स्वीकार कर लिया गया।
तो वहीं दूसरी तरफ एक धारणा यह भी है कि यह यक्ष परंपरा का ही विस्तार है। कालांतर में वैदिक संस्कृति के उपासकों ने इस को अपनाया एवं इसे दुर्गा देवी की पूजा में सम्मीलित कर लिया गया होगा।

मातृका पूजन की परंपरा को सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़कर भी देखा जाता है। पश्चिमी एशिया के ‘द्रो’ नामक प्राचीन संस्कृति में तथा मोहेंजोदडों एवं हडप्पा में स्थित सिन्धु संस्कृति में मातृकाओं की पूजा की जाती थी। उस संस्कृति के जो सिक्के प्रप्त हुए हैं, वहाँ मातृका के सामने नर अथवा पशुबलि के दृश्य चित्रित किये गये है। माना जाता है कि पांचवीं सदी तक आते आते इन देवियों को हिन्दू धर्म में देवियों के रूप में शामिल कर लिया गया था।

मातृकाओं की प्राचीनता का उल्लेख ग्रंथों और मिले हुये शिलालेखों से प्रमाणित हो जाता हैं। इनमें से कुछ निम्न हैं:

• ऋग्वेद में सात नदियों एवं सात स्वरों को माता कहा गया है। साथ ही वहाँ सप्त माताओं का उल्लेख भी है और कहा गया है कि उनकी देखरेख में सोम की तैयारी होती थी।
• मार्कण्डेय पुराण में वर्णन मिलता है कि युद्ध में चण्डिका की सहायता के लिए सप्तमातृकाएं उत्पन्न हुईं थीं। इन्हीं सप्तमातृकाओं की सहायता से देवी ने रक्तबीज का वध किया था।
• ईसा की पहली शताब्दी से मातृका पूजन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के बृहत्संहिता मे एवं शूद्रक के मृच्छकटिकम् में मातृका पूजन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
• स्कंदगुप्त के बिहार स्तंभलेख में मातृका पूजन उल्लेखित है।
• गुप्त शिलालेख के अनुसार ४२३ ई. में मालवा के विश्वकर्मन राजा के अमात्य मयूराक्ष ने मातृकाओं का एक मंदिर बनवाया था ।
• पांचवी सदी के गुप्तसम्राट प्रथम कुमारगुप्त के गंगाधर लेख में मातृका के मंदिर का उल्लेख मिलता है।
• चालुक्य एवं कदंब राजवंश मातृकाओं के उपासक थे।

मातृकाओं की संख्या:

इन मातृकाओं की संख्या को लेकर भी अलग अलग मत हैं, एक मत के अनुसार इनकी संख्या सात हैं जिनके आधार पर इन्हें सप्तमातृका कहा जाता है। पांचवी सदी के गुप्तसम्राट प्रथम कुमारगुप्त के गंगाधर लेख में मातृका के मंदिर का उल्लेख है, इस लेख में उनकी संख्या का उल्लेख नहीं है, किन्तु बाद के चालुक्य प्रशस्ति में वर्णित-‘हारीति पुत्राणां सप्तमातृका भिर भिवर्धितानाम्’ वाक्य के आधार पर इनकी संख्या सात मानी जाती रही है। इन कतिपय साक्ष्यों के आधार पर इतना तो अवश्य माना जा सकता है कि सप्तमातृका की उपासना व पूजा का प्रचलन पांचवीं सदी के भारत में होने लगा था। मार्कण्डेय पुराण में वर्णन मिलता है कि सप्तमातृकाओं की सहायता से चण्डिका देवी ने रक्तबीज का वध किया था। ये सात देवियां अपने पतियों के वाहन तथा आयुध के साथ यहां उपस्थित होती है ‘यस्य देवस्य यत्रूपं यथाभूषण वाहनम्’। यह सात देवियां हैं ब्राह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री व नारसिंही। इन सात के साथ जब चामुण्डा को मातृकाओं की गणना में शामिल कर लिया जाता है तो यह संख्या आठ हो जाती हैं। कुछ स्थानों पर नारसिंही के स्थान पर चामुण्डा को जगह दे दिया जाता है। इस तरह हम पाते हैं कि जहां नारसिंही और चामुण्डा दोनों को इसमें शामिल किया जाता है वहां यह संख्या आठ हो जाती है अन्यथा यह सात ही रहती है। वराह पुराण में सात नहीं बल्कि आठ मातृकाओं का विवरण है। सातवीं मातृका के तौर पर यमी का और आठवीं के रूप में योगीश्वरी है, जो शिव के मुख से निकली ज्वाला से प्रगट हुई। लेकिन आठवीं को कभी-कभी भगवान नरसिंह के समकक्ष नारसिंही को भी माना गया है। इनके अलावा विभिन्न ग्रंथों में मातृकाओं की सूची मे काफी मतभिन्नता है।

नेपाल में अष्टमातृका की पूजा होती हैं। भक्तपुर स्थित मंदिर में इन आठ मातृकाओं के केन्द्र में एक नौवीं मातृका का भी अंकन है। किन्तु वहाँ अष्टमातृकाओ की सूची में नारसिंही के स्थान पर महालक्ष्मी की पूजा होती हैं।

मातृकाओं की प्रतिमा:

मातृकाओं की प्रतिमाओं की पूजा सारे भारत भर में की जाती है, जहाँ इनका रुप अर्धनग्न, शिरोभूषण, कण्ठहार तथा मेखलायुक्त दिखाई देता है। जनश्रुति के अनुसार, मातृकाओं की सर्वाधिक पीडा दो वर्षो तक के बालकों को होती है। इसी कारण बालक का जन्म होते ही पहले दस दिन मातृकाओं की पूजा की जाती है। एक शास्त्र, परंपराओ से दूसरे शास्त्र, परंपराओ तक आते-आते मातृकाओं की अवधारणाएं, रूप रंग और प्रकृति में समय-समय पर तेजी से बदलाव आता रहा है। मातृकाओं का आसानी से पहचाने जाने योग्य कोई सार्वभौमिक मानक नहीं था। पुराणों में वर्णित मातृकाओं और मूर्तिकला के बीच एक बेमेल संबंध था।

पुराण और मातृकाये:
पुराणों में मातृकाओं को राक्षसों से लड़नेवाली क्रूर, रक्त पीने वाली, भीषण योद्धा देवी के रूप में दर्शाया गया हैं। उनमें किसी तरह के मातृ-गुणों को संदर्भित नहीं किया गया और उनके नाम और संख्याएँ भी भिन्न-भिन्न थी।
कुषाण काल में एक ‘बालग्रह’ नामक एक देवता पूजे जाते थे, जिन्हें मातृका कहा जाता था, जो पांच या सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए हानिकारक माने जाते थे।

तंत्र और शक्ति पंथ में मातृकाये:
गुप्त काल और मध्ययुगीन शताब्दियों के दौरान लोकप्रिय तंत्र और शक्ति पंथ जो पुरुष और महिला सिद्धांतों के सह-अस्तित्व में विश्वास करते थे। उन्होने पहले से ही विद्यमान अवधारणा में नया परिवर्तन करके पुरुष देवताओं के स्त्रीलिंग स्वरूप को देवी के रूप में एक नारी प्रधान शक्ति के रूप में पुन: प्रस्थापित किया। इस कारण से मातृकाओं की संख्या, नाम और संकेत मानकीकृत होने लगे।

इस नए पंथ ने मातृकाओं को तेजस्वी, कृपापात्री, परोपकारी और देखभाल करने वाली देवी माताओं के रूप में चित्रित करना शुरू किया, जिसमें मातृकाये बच्चों को अपनी गोद में ले कर रखती हैं और उसी के साथ वे अस्त्र-शस्त्र भी अपने दूसरे हाथों में पकड़ती हैं। मातृकाओं की ये प्रतिमायें पौराणिक प्रतीकों और अभिव्यक्ति का सुंदर सामंजस्य था, जो आज तक चला आ रहा हैं। भारत में सप्तमातृकाओं की एकल व संयुक्त प्रतिमाएं मुख्यत: तीन रूपों में पायी जाती हैं-

1. स्थानक यानी खड़ी प्रतिमा,
2. आसनस्थ यानी बैठी हुई प्रतिमाएं,
3. नृत्यरत प्रतिमा।

पुराणों में जो वर्णन है उसके अनुसार मातृका के चार हाथ हैं व गोद में शिशु है। कुछ प्रतिमाओं में उनके वाहन और ध्वजा को अंकित किया गया है तो कुछ स्थानों में उनके आसनों के रूप में उनके वाहन या सवारी का अंकन भी मिलता है। विष्णुधर्मोत्तर और सुत्रधारमंडन रचित ग्रंथ रूपमंडन के अनुसार सप्तमातृका के आरंभ में वीरभद्र और अंत में गणेश की प्रतिमा होनी चाहिए। साधारणतया मातृकाओं की प्रतिमा या चित्रो के लिये निम्न मानक स्थापित किये गये हैं:

1. ब्राह्माणी की प्रतिमा में उनका रंग सुनहरा और उनके चार सिर व चार भुजाएं हैं। एक हाथ वरद मुद्रा में तो दूसरा अभय मुद्रा में और तीसरे हाथ में यज्ञपात्र है। इनका वाहन हंस है और गोद में शिशु है।

2. माहेश्वरी का रंग गोरा हैं और जटाओं में अर्धचंद्र हैं। उनका वाहन नंदी है, चर्तुभुजाओं में त्रिशूल, अक्षमाला, खड्ग और एक हाथ अभय मुद्रा में है।

3. कौमारी के छः सिर और दस हाथ हैं उनका केश विन्यास भी कार्तिकेय की तरह है। उनका वाहन मयूर है। वे अपने हाथों में शक्ती, ध्वाजा, दण्ड, धनुष, बाण, अक्षमाला, कुक्कुड और कमंडलु धारण करती हैं। उनके दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं।

4. वाराही धूम्रवर्णीया और विष्णु के वराह अवतार की तरह चेहरा वराह का व धड़ मनुष्य का है। वराहपुराण के अनुसार चर्तुभुजी प्रतिमा का वर्णन है जिन मे वे दंड़, खड्ग, खेतका और फाश धारण करती है। वाहन के रूप में कहीं मेष तो कहीं भैंसा अंकित रहता है।

5. वैष्णवी का रंग गहरा और सौम्य रूप हैं, आभूषण और वनमाला पहने हुये हैं। उनके दो हाथों में शंख व चक्र हैं तो तीसरा हाथ अभयमुद्रा में व चौथे में शिशु को गोद में लिए हुए हैं। इनकी सवारी विष्णु की तरह गरूड़ ही है।

6. ऐन्द्री या इन्द्राणी का रंग सुनहरा लाल हैं और वे अपने वाहन हाथी पर विराजमान है। उनके दो हाथ क्रमश: अभय तथा वरद मुद्रा में व तीसरे हाथ में आयुध के तौर पर वज्र और चौथे हाथ में शिशु विराजमान है।

7. चामुण्डा का रंग गहरा लाल हैं और लगभग काली की तरह ही रौद्र मुखमुद्रा व गले
में मुण्डमाल शोभित है। उनके हाथों में कपाल, शूल, नरमुण्ड तथा अग्नि है व वाहन श्रृगाल यानी सियार है। खजुराहो में प्राप्त चामुंडा की प्रतिमा के छ: हाथ हैं जिनमें डमरू, त्रिशूल, अंकुश, खप्पर व नरमुंड और अग्नि हैं।

8. नारसिंही की प्रतिमा का चेहरा सिंह का है व धड़ मानव का। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, त्रिशूल, डमरू, नाग का फंदा और खोपड़ी में से कोई भी चार प्रतीक होते है।

आजकल मातृकाओं को मंदिर की दीवारों पर या छोटे से आले जैसी जगह एक पंक्ति में उकेरा जाता है। इन सभी के चेहरों को एक जैसा ही बनाया जाता है। वे मुकुट, गहनों से अच्छी तरह से सुसज्जित होती हैं और अपने पुरूष देवताओं की तरह अस्त्र-शस्त्र और प्रतीक धारण करती हैं। उनकी पहचान केवल उनके अस्त्र-शस्त्र और प्रतीक से होती हैं और कहीं-कहीं नीचे उनका नाम खुदा होता हैं। मध्य शताब्दी तक आते-आते मातृकाओं ने लोकप्रिय धार्मिक प्रथाओं में अपना महत्व और स्थान खो दिया। आज वे केवल देवालयों के किनारे पर कही सिमट कर रह गई हैं।

संदर्भ:

singhh63.blogspot.com

https://sreenivasaraos.com/tag/saptamatrika

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

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Wikipedia

www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

https://www.speakingtree.in/blog/saptamatrka-part-two-origins-and-the-overview

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

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  Sapt Matrika

“Matrika” is derived from the root word ‘Matr’ (मातृ) meaning ‘mother.’ She is believed to be the power which is the epitome of motherly virtues and also a protector, provider and nurturer of all the powers in this universe. Just like everything on earth derives its source energy from the Sun, all the energies of the universe acquire their power from the Matrika. Matrika plays a very important role in Tantra because of her innate ability to procreate exactly like herself. She can clone herself exactly and produce other powers and forms. She is everywhere and in everything in her subtle form but in her manifested form she is believed to be present in the universe, ruling the eight directions which also symbolize infinity.

Pre-creation Origin:

Matrika was always present in her original form as Yogmaya.  She is the supreme power of this universe.  Shiva is the supreme God and within him resides Yogmaya. Because of Yogmaya, Shiva is considered to be Ishwara. The absence of the power of Yogmaya transforms Shiva into Shava or a corpse.

She existed within Shiva even before the creation. Shiva’s prime duty is to annihilate all earlier creations so that a new creation unfolds. But this destruction occurs at the right time, like Nature allowing a flower to bloom to its peak and then destroying it by withering it, creating the opportunity for new flowers to bloom.

For this to happen Lord Shiva needs power and energy that can nurture the universe to blossom like a flower, like a mother for a new creation. This energy is called “Matrika Punja” which multiplies itself to merge into every part of this universe. Thus Matrika became present everywhere in the creation. It is because of her that the universe self sustains and self-nurtures itself until the point of annihilation. After annihilation of a creation, a new creation takes place and the same Matrika then plays the role of sustainer and nurturer of the new universe.

The story of her origin:

According to“Siddha Dharma” there are two most prevalent stories of the origin of Matrikas. Both these stories were revealed by Maharishi Vishwamitra.

There are eight Matrikas but they do not manifest together. The first three Matrikas are Kaumari, Vaishnavi and Brahmi. Subsequently, Shiva manifests as Tridev, the three God-heads Brahma, Vishnu and Shiva.

Kaumari manifests as Parvati, Vaishnavi as Lakshmi and Brahmi as Saraswati . Then these three Matrikas become the seven Mothers or Sapta Matrika. In dues course they transform to become eight or Ashta Matrika, then sixteen or Sodash Matrika and then to thirtytwo main Matrikas.

Post-creation Origin:

As per “Siddha Dharma”, it is said that after the first creation, the universe went into cycles of creation and annihilation. Shiva and Yogmaya descended to Mount Kailash in the Himalayas to impart the timeless wisdom of Agama-Nigama to the saints and sages. They would frequently engage in conversations with each other about tantra and those talks were heard by the saints and sages as well as siddhas and also Maharishi Vishwamitra. They then decoded these talks and went on to spread this knowledge to the masses.

Saptamatrika is a group of seven mother-goddesses, each of whom is the shakti or female counterpart of a male God. They are Brahmani (the power of Brahma), Maheshwari (the power of Shiva), Kaumari (the power of Kumar Kartikeya), Vaishnavi (the power of Vishnu), Varahi (the power of Varaha, the boar incarnation of Vishnu), Indrani (the power of Indra), and Chamunda or Yami (the power of Yama).

Varaha Purana states that they are not seven but eight, the eighth being Yogeshwari who was created out of a flame from Shiva’s mouth. The eighth is sometimes said to be Narasinghi, the counterpart of Lord Narasimha.

Devi Mahatmyam:

According to Devi Mahatmyam, Durga created the Matrikas from herself. When demon Shumbha challenges Durga for a combat, with the help of Matrikas she slaughtered the demon army. After that she killed him and sucked the blood of demon Raktabija. Kali is given the epithet ‘Chamunda’ after she killed the demons named Chand and Munda. Kali is described as a Matrika. Devi Mahatmyam says that they are all her different forms and after the perpose is fullfills she absorbs the Matrikas in herself again.

Matsya Purana & Vishnudharmottara Purana:

In Matsya Purana, Shiva creates seven Matrikas to combat the demon Andhaka, who had the ability to duplicate from each drop of his blood that falls from him when he is wounded. The Matrikas drink up his blood and help Shiva defeat the demon. After the battle, the Matrikas begin a rampage of destruction by starting to devour other gods, demons and people of the world. Narasimha, Vishnu’s man-lion incarnation, creates a host of thirty-two benign goddesses who calm down the terrible, fire-breathing Matrikas. Narasimha commanded the Matrikas to protect the world, instead of destroying it and thus be worshipped by mankind.

Allegory of the Sapta-Matrikas:

Shiva is the spirit of knowledge. Andhaka represents ignorance or darkness. The more knowledge attacks ignorance, the more it tends to rise and increase. This is represented by the multiplication of Andhaka and secondary asuras. Unless the eight evil qualities, desire, anger, greed, arrogance, delusion, envy, slandering and malice (kama, krodh, lobha, mada, moha, matsarya, paisunya, and asuya) are completely brought under the control of knowledge and kept under restraint, it can never succeed in putting down Andhakara (darkness).

In Varaha Purana, they are created from the distracted mind of goddess Vaishnavi, who loses her concentration while performing certain austerities. The Sapta Matrikas are affiliated to Mother Shakti and Skanda, the warrior God. The Puranas also state that the Matrikas rule various substances of the body.

Brahmani: skin,

Maheshwari: blood,

Kaumari: muscles

Vaishanvi; bone,

Aindri: bone marrow,

Chamunda: semen.

These Matrikas are considered to be the main goddesses of the above basic living elements of the body.

Idols of Matrkas

Matrkas’ concepts, appearances and nature change rapidly from period to period, from text to text and from tradition to tradition. There is no standardized universally recognizable form of the Matrkas.

Individually they are depicted as benevolent and graceful mother-like goddesses. But, in groups they appear as warriors; and their names and numbers also differ.

Purans and matrikas:

The Matrkas of the Puranas are invariably gruesome female warriors fighting the demons. The ferocious, blood-drinking Matrkas are not referred to as mothers; nor is there a reference to their ‘motherly-qualities’.

Kushana period had Balagraha deities called Matrkas, which were dangerous for children from the age of five up to the age of sixteen.

Mothers in Tantra and Shakti Panth:

Popular tantra and power cults during the Gupta period and medieval centuries believed in the coexistence of male and female theories. They made a new change in the already existing concept and reinstated the feminine form of the male deities as a female dominant power in the form of a goddess. In due course of time, the number, names and signs of the mothers were standardized.

This new creed began to portray Matrika as stunning, graceful, benevolent and caring mother goddesses, with babies in their laps and holding weapons in their hands. These statues of the Matrikas were a beautiful harmony of mythological symbols and expressions, which have been practiced till date.

In India, single and joint statues of Saptmatrikas are found mainly in three forms –

      1. Sthanak means standing statue,
      2. Asanastha means sitting idols,
      3. Dancing Statue.

According to the description in the Puranas, the mother has four arms and a baby in her lap. Some statues have their vehicle and flag inscribed, while in some places their vehicle is marked as their pedestal. Generally, the following standards have been established for the images or pictures of the matrikas:

      1. The statue of Brahmani is golden in color and has four heads and four arms. One hand is in Varada mudra, the other is in Abhaya mudra and in the third hand is Yajnapatra. Her vehicle is a swan and she has a baby in her lap.
      2. Maheshwari has a fair complexion and her hair has a crescent moon. Her vehicle is Nandi and she carries in her four hands a trident, akshamala, kharag and one hand in Abhaya mudra.
      3. The color of Vaishnavi is dark and gentle, wearing jewelery and a forest flowers garland. She has a conch and chakra in her two hands, the third hand in Abhaya mudra and the fourth one in Varada mudra. She rides Garuda like Vishnu.
      4. Kaumari has six heads and ten hands. Her hairstyle is also like Karthikeya’s. Her vehicle is Peacock. She holds Shakti, Dhwaja, Dand, Dhanush, arrow, Akshamala, Kukkud and Kamandalu in her hands. Her two hands are in Abhaya and Varada mudra.
      5. Varahi is of the colour of smoke, with a face of a wild boar and torso of a woman, like her counter part Varaha who is incarnation of Vishnu. According to the Varahapuran, there is a description of the Chaturbhuji statue, in which she bears the Dandam, Noose, Sword and Khetka. Somewhere in the form of a vehicle is Aries, sometimes a buffalo.
      6. The color of Aindri or Indrani is golden red and she sits on her vehicle, the elephant. Her two hands respectively in Abhaya and Varada mudra and Vajra as armament in third hand and infant in the fourth hand.
      7. The color of Chamunda is dark red and almost like Kali, with a countenance of anger, an abnormal mouth and a garland of skulls in her neck. She carries a human skull, a trident and fire in her hands and her vehicle is a jackal. The statue of Chamunda received or acquired at Khajuraho has six hands, including Damru, Trishul, Ankush, Khappar and Narmund and Agni.
      8. The face of the statue of Narasimhi is that of the lion and the torso of a human. Her four hands have a conch, chakra, trident, damru, snake noose and skull any of the four symbols from these.

Nowadays, the matrikas are carved on the walls of the temple or in a small niche in a row. The faces of all of them are made the same. They are well equipped with crowns, jewels and carry weapons and emblems like their male deities. They are identified only by their weapons and emblems and their names are inscribed below. According to Vishnudharmottara and the book Rupmandan written by Sutradharmandan, describe that Saptamatraka should have a statue of Veerabhadra at the beginning and Ganesh at the end.

The Matrkas, however, lost much of their significance and position in the popular religious practices during the middle centuries. But, they continued to appear in temple panels and niches. Today, they linger on the fringes of the Hindu pantheon.

References:

singhh63.blogspot.com

https://sreenivasaraos.com/tag/saptamatrika

The Story Of Matrikas – Hindu Mythology

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www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/sapta-matrikas-the-seven-divine-mothers/

https://www.speakingtree.in/blog/saptamatrka-part-two-origins-and-the-overview

kaulapedia.com/en/ashta-matrika/

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